Thursday, April 15, 2010

राजस्थानी को सोवियत रूस ने समझा, हमने नहीं

Bhaskar News
First Published 02:15[IST](15/04/2010)
Last Updated 02:15[IST](15/04/2010)

जयपुर. राजस्थानी भाषा के गौरव और समृद्धि की अहमियत को सोवियत रूस जैसे बड़े देश तक ने समझा लेकिन हम नहीं समझ पाए। तत्कालीन सोवियत रूस के लेखक बोरिस आई क्लूयेव सहित कई विद्वानों ने 70 के दशक में राजस्थानी भाषा पर शोध कर इसके समग्र स्वरूप को मान्यता देने की वकालत की थी।

बोरिस ने राजस्थानी की विभिन्न बोलियों पर अपने शोध में कहा था कि राजस्थान में भाषा स्थिति इतनी जटिल नहीं है जितनी पहली बार में दिखाई देती है। इसके अलावा राजस्थानी भाषा की आंचलिक बोलियों के आधार पर राजस्थानी के स्वरूप को बिगाड़ने और इसमें विभेद पैदा करने की कोशिशों को भी गलत बताया है।

क्लूयेव ने स्वतंत्र भारत

जातीय तथा भाषाई समस्या विषय पर शोध शुरू किया तो राजस्थानी ने उन्हें बेहद प्रभावित किया। उन्होंने राजस्थान में संजाति—भाषायी प्रक्रियाएं शोध में साफ लिखा, राजस्थानी की विभिन्न बोलियों में से ज्यादातर एक ही बोली समूह की हैं। इन बोलियों की पुरानी साहित्यिक परंपराएं हैं। प्राचीन मरू भाषा से डिंगल के साहित्य और से अब तक राजस्थानी ने साहित्यिक भाषा के प्रमुख पड़ाव तय किए हैं।

1961 की भाषाई जनगणना के अनुसार राजस्थानी को अपनी मातृभाषा बताने वालों की संख्या 1.50 करोड़ थी। राजस्थानी बोलने वालों की राजस्थान के बाहर भी अच्छी खासी तादाद है। संख्या के हिसाब से राजस्थानी देश की 12वीं प्रमुख भाषा है और 1961 की जनगणना में भाषाई गणना के हिसाब से भारत की प्रमुख भाषाओं के कम में इसे 12वें पायदान पर रखा गया। इसमें राजस्थान में रहने वाले 80 प्रतिशत लोगों की मातृभाषा राजस्थानी बताई गई है।

रूसी शोध में भी प्रमुख था मान्यता का मुद्दा


राजस्थानी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग का जिक्र रूसी विद्वान के शोध में भी था। राजस्थानी को 60 के दशक से राजभाषा की मान्यता देने की मांग उठाई जा रही है।

करणीसिंह ने लोकसभा में रखा था विधेयक


बीकानेर सांसद और पूर्व राजा करणीसिंह ने 1980 में राजस्थानी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए एक विधेयक लोकसभा में विचारार्थ रखा था। उस समय इस विधेयक पर बहस हुई और लोकसभा में यह 92 के विरुद्ध 38 मतों से गिर गया। तब से लेकर राजस्थानी को मान्यता का मुद्दा अभी अनिर्णीत ही है।

राजस्थानी ने लुभाया इन रूसी विद्वानों को

एल.वी. खोखोव : राजस्थान में प्रयुक्त हिंदी और राजस्थानी भाषाएं- सामाजिक तथा वैज्ञानिक अनुसंधान का अनुभव (शोध प्रबंध 1974, मास्को)।
लुई एसेले : भारत के चित्र 1977 (मास्को)

7 comments:

  1. राजस्थानी भाषा पर चल रही बहस जिस तेजी के साथ चल रही है बह समय की बर्बादी के आलावा कुछ नहीं है
    मेरे ख्याल से राजस्थानी भाषा पर बात करके कुछ ख़ास होने वाला तो है नहीं फिर और कोई मुद्दे क्यों नहीं ???

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  2. सोनिया जी बात करके ही हर समस्या का विकास का जन्म होता है तो राजस्थानी भाषा तो फिर हमारी शान है
    इसके बारे में बात करके हम गर्व महसूस करते है और हर बार करना चाहते है

    जय हिन्दुस्तान - जय राजस्थान

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  3. सोनिया जी,

    कृपया इस लिंक को देखलें फिर बोलें.


    http://yaadonkaaaina.blogspot.com/2010/04/see-in-english-down-this-post-64-email.html#comments

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  4. राजस्थानी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाना चाहिये इसमें कोई दो राय नहीं है. मेरे ख़याल से सबसे बड़ी बाधा है इसका राज्य के अलग अलग भागों में इसका अलग अलग व्याकरण का होना जोधपुर की राजस्थानी अलग है तो शेखावाटी की अलग है. उदयपुर की बोली अलग है तो फलोदी की भी अलग है . अलवर और भरतपुर की बोली भी अलग है. इसलिए राजस्थानी भाषा का एक सम्माहित व्याकरण बनाया जाना चाहिये जो सभी को मान्य हो. मेरे ख़याल से इसके बाद कोई बाधा नहीं आएगी. ये सिर्फ मेरी सोच है. हो सकता है मैं गलत भी हूँ. लेकिन मुझे यह महसूस हुआ इसलिए मैंने अपने विचार लिखे हैं.

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  5. भाई नरेशचन्द्र जी, आपने लेख को ठीक से पढ़ा नहीं। पढ़ते तो सवाल नहीं करते। आपकी बात का बुरा नहीं मानूंगा। यह लेख भी आप ही जैसे कुछ लोगों के जवाब में लिखा था। अखबारों में छपा भी। आप भी पढि़ए।

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  6. जनपद री बोल्यां है मिणियां, माळा राजस्थानी।

    -सत्यनारायण सोनी, प्राध्यापक-हिन्दी

    मंत्रियों और पूर्व मंत्रियों ने अपने बयानों में राजस्थानी को बचाना जरूरी माना है और दबी जुबान में कुछ शंकाएं भी प्रकट की हैं, जो कि पूर्णतया बेमानी और आधारहीन हैं। यह उनकी भाषाई समझ के दिवालिएपन का द्योतक कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। राजस्व मंत्री हेमाराम चौधरी को चिंता है कि अभी तक यह तय नहीं हो पाया है कि राजस्थानी भाषा किसे कहा जाए, क्योंकि हर क्षेत्र में अलग-अलग बोलियां हैं। हम राजस्व मंत्री महोदय को याद दिलवाना चाहते हैं कि बोलियां किसी भी भाषा की समृद्धता की सूचक होती हैं। दुनिया के समस्त भाषाविद यह मानते हैं कि जिस भाषा में जितनी अधिक बोलियां होंगी वह उतनी ही समृद्ध होगी। बिना अंगों के शरीर की तरह से होती है बिन बोलियों के भाषा। भाषा अंगी और बोलियां अंग होती हैं। हिन्दी की अवधी, बघेली, छतीसगढ़ी, ब्रज, बांगरू, खड़ी, कन्नौजी, मैथिली आदि बोलियां ही तो हैं। हिन्दी की पाठ्यपुस्तकों में अवधी के तुलसी, ब्रज के रसखान और सूर, मैथिली के विद्यापति, सधुक्कड़ी के कबीर आदि गर्व के साथ पढ़ाए जाते हैं। भाषाई विभिन्नता के बावजूद भी प्रेमचंद, हजारी प्रसाद द्विवेदी और फणीश्वरनाथ रेणु हिन्दी के आधुनिक गद्य लेखकों के रूप में प्रसिद्ध हैं। पंजाबी की पोवाधि, भटियाणी, रेचना, सेरायकी, मांझी, दोआबी, अमृतसरी, जलंधरी आदि कितनी ही बोलियां हैं और वह विश्वभर में सम्मानित है। इसी भांति राजस्थानी की मेवाती, मेवाड़ी, हाड़ोती, ढूंढाड़ी, मारवाड़ी, मालवी आदि बोलियों के बावजूद लेखन के स्तर पर एक ही भाषाई रूप प्रचलित है। अंचल विशेष के प्रभाव से कहीं-कहीं विविधता नजर आती है तो वह कमजोरी नहीं भाषा की, खासियत है। साहित्य के लिए यही अनिवार्य शर्त होती है कि उसमें हर स्तर पर लेखक का परिवेश बोलना चाहिए। हम माननीय हेमारामजी से निवेदन करना चाहते हैं कि राजस्थानी भाषा में प्रकाशित होने वाली दर्जन-भर पत्र-पत्रिकाएं अपने घर पर मंगवाएं। ग्यारहवीं से लेकर एम.ए. तक की पढ़ाई में शामिल राजस्थानी साहित्य की पाठ्यपुस्तकें पढ़कर देखें। बाजार में उपलब्ध राजस्थानी लोकगीतों के केसेट्स व ऑडियों-वीडियो सीडी घर पर लाकर कभी फुरसत में सुना करें। और फिर अपना वही सवाल दोहराएं। राजस्थानी के अनुभवी और विद्वान लेखकों ने पाठ्यपुस्तकें ऐसी तैयार की हैं कि उनमें हर विद्यार्थी को अपनेपन की महक आती है। सिंहासन पर बैठकर आदमी अपनी जमीन से कट जाता है और किसी विषय में अल्पज्ञानी होते हुए भी बड़ी-बड़ी डींगें हांकने लगता है।
    ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री भरतसिंह की कमोबेश यही चिंता है जिसका जवाब ऊपर की पंक्तियों में आ चुका है, मगर उनके इस बयान से हमें घोर आपत्ति है कि हिन्दी और अंग्रेजी ऐसी भाषाएं हैं जिसे हर क्षेत्र का व्यक्ति सहजता से समझ सकता है। माननीय भरतसिंह जी, आप अपने निर्वाचन क्षेत्र में इन्हीं भाषाओं में वोट क्यों नहीं मांगते? क्योंकि आपकी वोटर-जनता तो इन्हें सहजता से समझती है। घर के शादी-समारोहों, व्रत-त्योहारों और उत्सवों पर भी इन्हीं भाषाओं के गीत गाए जाते होंगे आपके यहां? हाड़ोती के लोग अगर हिन्दी और अंग्रेजी का इस्तेमाल करते हैं तो घर-परिवार में नहीं। जहां जरूरत हो इनकी वहां किया भी जाना चाहिए। राजस्थानी का सम्मान करने का मतलब किसी अन्य भाषा की अवहेलना नहीं होता, सबसे पहले तो आपको यह समझ लेना चाहिए। हाड़ोती अंचल के बहुत-से आयोजनों में जाने का मौका मिला है। ठेठ हाड़ोती में बातचीत करते हुए देखता रहा हूं और मंचों से बोलते हुए भी सुना है मैंने लोगों को। बहुत-से लेखक मित्रों यथा- अतुल कनक, प्रहलाद सिंह राठौड़, डॉ. शांति भारद्वाज राकेश, गिरधारी लाल मालव आदि से फोन पर बातचीत भी ठेठ राजस्थानी भाषा और बाकायदा उनके हाड़ोती लहजे में होती है। माननीय भरतसिंहजी, हम जानते हैं और इसलिए आपकी प्रशंसा सुन चुके हैं कि आप जनसभाओं को ठेठ हाड़ोती में सम्बोधित करते हैं, फिर आज आपने यह बयान दिया है तो हमें बड़ा अचरज हो रहा है।

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  7. मैंने लेख को ध्यानपूर्वक पढ़ा है. मेरा सिर्फ यही कहना है कि अगर एक सर्वमान्य व्याकरण बन जाए तो इसमें कोई बुराई नहीं है. उल्टा हमारी राजस्थानी भाषा को फायदा ही होगा. इसे राज्य में तीसरी भाषा के रूप में शिक्षा में शामिल भी किया जा सकता है. ये सुझाव अलग से है. इसका संविधान की आठवीं सूचि में शामिल करने से कोई लेना देना नहीं है. राजस्थानी भाषा का एक समृद्धशाली इतिहास रहा है और कई ग्रन्थ और कविता संग्रह छप चुके हैं . ब्लॉग के जरिये भी इसको और अधिक बढ़ावा दिया जा सकता है जिससे अधिक से अधिक लोग अपनी भाषा में लिखें; पढ़ें और इसे राष्ट्रीय स्तर पर फैलाये. मैं यह भी बताना चाहता हूँ कि अगले सप्ताह से मैं भी एक राजस्थानी में ब्लॉग आरम्भ करने जा रहा हूँ. आशा है आप मेरी प्रतिक्रिया को अब समझ गए होंगे.

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--- संजय सेन सागर

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