Thursday, April 1, 2010

कभी खिलाड़ी कभी अनाड़ी


हम पैसे का एक बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार में बरबाद होने देते हैं। हम अरबों डॉलर काला धन स्विस बैंकों में पड़ा रहने देते हैं और वह भी तब जब स्विस इस धन के स्वामित्व के ब्योरे उजागर करने को तैयार हों। हम लाखों लोगों को भूखों मरने देते हैं, जबकि लाखों टन अनाज खुले में सड़ रहा होता है। हम एक ही समय में इतने कुशल रूप से भ्रष्ट और अनाड़ी कैसे हो सकते हैं?



भारत में हर चुनाव तीन वादों के आधार पर लड़ा जाता है। पहला - भ्रष्टाचार से लड़ाई और भ्रष्ट को सजा। दूसरा - अर्थव्यवस्था में काले धन की आवाजाही सीमित करना और विदेशों में इसे जहां भी गुपचुप तरीके से जमा किया गया है, वहां से उसे वापस लाना। तीसरा - मुद्रास्फीति से जूझना और महंगाई को नियंत्रित करना ताकि आप और हम हर साल मुद्रास्फीति से हारी हुई लड़ाई लड़ने की बजाय अपने जीवन स्तर के मानकों की रक्षा कर सकें।


मजे की बात तो यह है कि ठीक यही वे बिंदु हैं, जिन पर सभी सरकारें विफल रहती हैं। वह इसलिए नहीं विफल रहतीं कि उन्होंने कोई गंभीर प्रयास किया था और अपना लक्ष्य नहीं पा सकीं। वे इसलिए विफल रहती हैं क्योंकि ये वादे कभी पूरे करने के लिए किए ही नहीं गए थे। भारत के शासकों ने हमेशा ही भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन दिया है, क्योंकि यह सत्ता की विशालकाय मशीनरी के लिए उस तेल की तरह है, जो उसे सुचारुरूप से चलाता रहता है। वे भ्रष्टों को भी प्यार करते हैं, क्योंकि हमारे द्वारा बोली जाने वाली तमाम भाषाओं हिंदी, अंग्रेजी, बांग्ला, तमिल, मराठी इत्यादि के विपरीत भ्रष्टाचार की भाषा वैश्विक है।



यह दलों, गुटों, टेढ़े-मेढ़े राजनीतिक लक्ष्यों को एक-दूसरे से जोड़ती है। यह सत्ता की शब्दावली है। आप और हम भ्रष्टाचार से नफरत कर सकते हैं और उसे एक कुरूप चीज बताते हुए नाक-भौं सिकोड़ सकते हैं, लेकिन सत्ता के साथ खेलने वालों को पसंद है कि भ्रष्ट लोग उनके इर्द-गिर्द हों। यही वे लोग हैं, जो सौदे पटाते हैं, समस्याएं सुलझाते हैं और हर राजनीतिक अवसर को भुना लेना जानते हैं। उनके बिना हम एक संकट से दूसरे संकट तक भटकते रहेंगे, क्योंकि भयादोहन और छीनाझपटी वर्तमान राजनीतिक प्रक्रिया के अहम हिस्से बन चुके हैं। भारत के सत्ताधीशों के अधिकांश लेन-देन अंधेरे कोनों में भ्रष्टाचार के सिक्कों से ही होते हैं।



भ्रष्टाचार और काले धन का चोली-दामन का साथ है। इसलिए भ्रष्टाचार पर निर्भर सत्तासीनों से यह उम्मीद करना बेकार ही है कि वे कभी काले धन के शिकंजे से मुक्त हो सकेंगे। चुनाव होते हैं, सरकारें गठित होती हैं और इसी के साथ काले धन से जूझने की सारी बातें भी हवा हो जाती हैं। हां, यदा-कदा हमें थोड़ी-बहुत हाय-तौबा सुनने को मिल जाती है ताकि सार्वजनिक नैतिकता की छवि बनी रहे। लेकिन सच्चाई तो यही है कि वे सभी काले धन की बहाली के एजेंडे को रफा-दफा करने को आतुर हैं।



यह केवल इसीलिए नहीं है कि हमारे राजनेता और नौकरशाह स्विस बैंकों से प्यार करते हैं (वास्तव में स्विस बैंकों में रखी धनराशि का सबसे बड़ा हिस्सा भारतीयों का ही है)। यह इसलिए भी है कि इस विशाल धनराशि (अनुमानित रूप से 500 से 1400 अरब डॉलर तक) की बहाली की प्रक्रिया यह उजागर कर देगी कि हमने राजनीतिक बिकाऊपन की क्या कीमत चुकाई है। हमारी राजनीति को संचालित करने वाली ताकत यही है। इसे आप रंगभेद से उल्टी स्थिति भी कह सकते हैं - ‘काला’ यहां ताकतवर है जबकि ‘सफेद’ आपके और मेरे जैसे तनख्वाह पाने वाले नाचीजों के लिए है।



तीसरा वादा जो कभी निभाया नहीं जाता, वह है मुद्रास्फीति से संघर्ष। अगर मंदी के कुछ डरावने महीनों को छोड़ दें, जिसने पूरी दुनिया को ही प्रभावित किया था तो हमने कभी कीमतों में गिरावट नहीं देखी। यदि कहीं कीमतें गिरती भी हैं या राजनीतिक श्रेय लेने की खातिर उन्हें गिराया जाता है तो विरोध की आवाजें इतने जोर-शोर से उठती हैं कि उसे वापस ले लिया जाता है। हमारे अधिकांश व्यवसाय मुद्रास्फीति पर ही पलते हैं।



वर्ली-बांद्रा सी-लिंक को ही ले लें। निर्माण प्रारंभ होने के समय इसकी अनुमानित लागत 300 करोड़ रुपए थी। लेकिन केवल निर्माण के दौरान ही इसकी लागत 300 से बढ़कर 1600 करोड़ रुपयों तक पहुंच गई। खाद्य सामग्रियों की कीमतें आसमान छूती रहती हैं और फिर भी किसानों को आत्महत्या करने को मजबूर होना पड़ता है क्योंकि उन्हें अपनी फसलों का उचित दाम नहीं मिलता। आखिर वे कौन लोग हैं, जो बीच में पैसा बना लेते हैं?



सीधी-सी बात है। दुनिया का कोई भी देश खाद्य सामग्रियों की लागतों में २क् प्रतिशत की बढ़ोतरी बर्दाश्त नहीं कर सकता, फिर चाहे वह कितना ही अमीर हो या फोब्र्स की फेहरिस्त में उसका चाहे कितना ही नाम हो। यह मूल्यवृद्धि तब और बदतर साबित होती है, जब देश की बड़ी आबादी भूखे पेट सोने को मजबूर हो।


मजे की बात तो यह है कि अतिप्रशंसित आम बजट में ईंधन की कीमतों में वृद्धि के साथ ही हमने अब कुल मुद्रास्फीति को दहाई के अंक तक पहुंचाने में भी कामयाबी हासिल कर ली है। यदि आपको लगता है कि वर्तमान आर्थिक परिदृश्य में यह भयावह है तो थोड़ा और इंतजार कीजिए। अर्थशास्त्री कहते हैं कि मुद्रास्फीति की दरें अभी और बढ़नी हैं, चाहे आपकी तनख्वाहों में बढ़ोतरी हो या न हो।


वैसे भी हमारी तनख्वाहें किसी भी स्थिति में मुद्रास्फीति की दरों के साथ होड़ नहीं कर पाएंगी। मुंबई में रहने वाला कोई व्यक्ति औसतन अपनी आय का 65 प्रतिशत हिस्सा केवल किराए-भाड़ों में खर्च करता है क्योंकि बिल्डरों ने सरकार के सहयोग से संपत्तियों की कीमतों का बड़ा-सा गुब्बारा फुला लिया है। अब वे इस पर 12 प्रतिशत सेवा कर भी जोड़ना चाहते हैं और इसकी शुरुआत व्यावसायिक किरायों से की जा रही है।

बीते सप्ताह हमने पंजाब में चूहों द्वारा दूषित लाखों टन अनाज की तस्वीरें देखीं, जो खुले में पड़ा सड़ रहा था। अनाज सड़ रहा था क्योंकि हमारे गोदाम बमुश्किल 1.6 करोड़ टन ही जमा कर सकते हैं, जबकि जरूरत 4.8 करोड़ टन जमा करने की है। तो जहां एक तरफ लाखों भारतीय भूख और कुपोषण से जूझ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ हम लाखों टन अनाज को इस तरह बरबाद होने दे रहे हैं।

यहां मेरा मकसद यह नहीं है कि इस विशाल घाटे से भारतीय राजकोष को हुए नुकसान का आकलन करूं। वह पैसा, जिससे हमें करों में राहत मिल सकती थी और कीमतों में गिरावट आ सकती थी। लेकिन मानवीय क्षति कहीं ज्यादा असहनीय है और कोई भी सरकार, जिसमें आत्मसम्मान हो, उसे इसके लिए जिम्मेदार लोगों को दंडित करना ही होगा।


दरअसल, वास्तविक समस्या यही है - क्षति। हम पैसे का एक बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार में बरबाद होने देते हैं। हम अरबों डॉलर काला धन स्विस बैंकों में पड़ा रहने देते हैं और वह भी तब जब स्विस इस धन के स्वामित्व के ब्योरे उजागर करने को तैयार हों। हम लाखों लोगों को भूखों मरने देते हैं, जबकि लाखों टन अनाज खुले में सड़ रहा होता है। हम एक ही समय में इतने कुशल रूप से भ्रष्ट और अनाड़ी कैसे हो सकते हैं?



लेखक वरिष्ठ पत्रकार और फिल्मकार हैं।



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