Monday, March 22, 2010

बिल्ली की कहानी..

कहते है की पुराने समय के जानवर भी बोलते थे॥ यह एक समय की बात है एक राजा था उसके तीन रनिया थी॥ लेकिन यह राजा का दुर्भाग्य था की उन तीन रानियों से एक भी औलाद नहीं पैदा हुयी। राजा बड़े चिंता में रहते थे। की हमारे राज्य का उतराधिकारी कौन बनेगा। एक दिन राजा को एक महात्मा जी मिले । राजा ने अपना दुखड़ा मुनिवर को सुनाया। तब मुनिवर ने कहा की हे राजां आप को पुत्र सुख तो लिखा है और यह भी लिखा है । की आप के एक ही औलाद होगा। और तीस रनिया तथा ३० पोते होगे। लेकिन आप को एक बिल्ली से शादी करना पडेगा। राजा को यह बात नागवार लगी । राजा वहा से उठ के चल दिए और मुनिवर भी चले गए । जब राजा को पुत्र की चिंता अधिक होने लगी तो लोगो के कहने पर राजा ने बिल्ली से शादी करने का निर्वे लिया। एक बिल्ली थी जो हमेशा पूर्णिमा को गंगा स्नान करने जाती थी और गंगा माँ से एक ही बार मांगती थी। की हे गंगे माँ हमारे एक लड़का पैदा हो और तीस बहुए और तीस पोते हो। राजा की शादी उसी बिल्ली से हो गयी आखिर कार बिल्ली गर्भवती हो गयी ये बात राजा को रानियों के द्वारा पता चला। तब राजा ने कहा की चलो ठीक है। तुम लोगो को तो कुछ होने वाला नहीं है चलो बिल्ली को तो गर्भ ठहर गया॥ ये बात रानियों को बुरी लगी जब बिल्ली को बच्चा देने का समय नजदीक आ गया तो । रानियों ने कहा की आप को बच्चा ऐसे नहीं होगा आप चूल्हा में सर को छुपा लो। बिल्ली ने वैसे ही किया॥माँ गंगे के आशीर्वाद से बिल्ली se एक सुन्दर बालक का जन्म हुआ लेकिन रानियों ने चतुराई से बालक को घर के पास कुए में डाल दिया॥ और बिल्ली को बता दिया की बिल्ली के बिल्ली के बच्चे ही जन्म लेगे वे भी मरे थे । जो हम लोगो से फिकवा दिया । बिल्ली बेचारी जानवर तो थी ही वह अपना दुःख दर्द किससे कहती । लेकिन वह हमेशा गंगा स्नान करती थी। धेरे पांच साल हो गए एक दिन किसी बालक के हंसने की आवाज कुए से सुनाई दी रानी ने कुए में झंका तो देखा की ५ साल का लड़का कुए के अन्दर खेल रहा है। वह सीधे कोपभवन में पहुची और लेट गयी ये बात राजा को पता चली की रानी तो कोप भवन में है। राजा देर न करते हुए कोपभवन में पहुचे।जब राजा ने रानी से कारन पूछा तो रानी ने कहा की आप सामने जो कुआ है। उसे भठवा दो । रजा ने बिना सोचे ही बोले ठीक है। सुबह राजा ने अपने नौकरों को आज्ञा दे दी की कुआ को भाट दिया जाय (पहले के जमाने में अगर किसी को हलाल करना मरना है तो उसे एक एक दिन पहले ही बता दिया जाता है॥) कुआ राजा की बुधि पर हंसा और लडके को समीप में रहने वाली कुतिया को दे दी॥ अब कुतिया भी ५ साल तक लडके का पालन पोषण किया एक दिन दूसरी रानी ने लडके को कुतिया के पास देख लिया फिर क्या था रानी ने पहली रानी की तरह किया लेकिन यह माजरा कुआ जैसे नहीं था राजा ने कुतिया को मारने का निमंत्रण भेज दिया अब कुतिया वहा पहुची जहा घोड़े रहते थे। कुतिया ने घोड़े से निवेदन किया । ५ साल तक कुआ और ५ साल तक मै इस बालक की परिवरिश किया अब समय आप को आ गया है। ५ साल तक आप इस लडके की देख भाल करे समय आने पर वक्त बताएगा की आगे क्या होगा। घोड़ा तुरंत राज़ी हो गया और लडके का पालन पोषण करने लगा। धीरे धेरे समय बाटता गया और एक दिन तीसरी रानी की नज़र की लडके पर पद गयी वह भी अन्य रानियों की तरह कोपभवन में जा पहुची ये बात राजा को पता चली तो राजा ने कहा की अब किसको मारने का हुक्म देना है। रानी ने तुरंत कहा घोड़े को। राजा ने बिना समय गवाए बिना सोचे समझे घोड़े को भी निमंत्रण भेज दिया । घोडा वेग में आया और लडके को लेकर्के रात में फुर्र हो गया। अब घोडा भागते भागते सातवे आसमान के तीसरे टापू पे जा पहुचा जहा पर बीरन जगह थी और ७ घर कुम्हार के थे। वही पर रूका अब तो लड़का भी समझदार था वह कुम्हार से बोला की मै आप की सेवा करूगा आप के बच्चो की देख भाल करूगा। आप हमें अपने यहाँ रहने दीजिये घोड़ा घूम घूम के चरता और मस्त रहता था। कुम्हार अपना काम करता था एक दिन की बात है दिवाली का समय था कुम्हार और कुम्हारिन अपने जजमानी में जा रहे थे तो जाते समय लडके को बोल करके गए थे की ये तीस नंदवा है। इसे रंग देना और बच्चा रोने न पाए कही इधर उधर मत जाना। लडके ने बोला ठीक है।अब कुम्हार और कुम्भाहरिन के जाने के बाद जब लड़का नंदवा रंगने के लिए रंग लेके आया तो पानी नहीं था और पानी कहा से लाया जाता है उसे पता भी नहीं था। नदी दूर पर थी अगर वह पानी लाने जाता तो बच्चे को कुछ भी हो सकता था इस लिए उसने सोचा अब क्या करे उसके मनमे एक विचार आया की अंदावा रंगा ही है, तो पानी ही चाहिए वह पेशाब करके तीसो नंदवा रंग दिया। उसके दुसरे दिन कुम्भर ने नंदवा राजा के घर भेज दिया राजा के तीस बेतिया थी दिवाली बीत जाने पर तीसो ने नंदवा की दियाली फोड़ कर खा लिया उसके नौ महीने बाद तीसो के एक एक लड़का पैदा हुआ अब राजा ने सोचा की अगर एक दो बेतिया बदचलन हो सकती है लेकिन तीसो तो नहीं हो सकती यह भगवन की कृपा ही है।राजा ने बड़े आनंद मन से अपने लडकियों के बच्चो का बारहव करने का निश्चय किया । और पूरे नगर मेंडुग्गी पिटवा दिया की परसों हमारे घर में बारहव है। गाँव का कोई सदस्य बाकी न रहे सब हमारे घर में आके खाना खायेगे। समय आया और लोग खाना खाने लगे तथा राजा का खुफिया तंत्र यह पता लगाने में जुटा था की कौन नहीं आया है। लोगो को नगर से ढूढ़ करके राजा के घर पर लाते थे। खाने के लिए अब कुंभार के घर पर गए तो पता चला की यह लड़का नहीगया था। बल्कि कुम्भारिन कहने लगी की हम इसके लिए खाना लाये है। यह घर पर ही खा लेना लेकिन सैनिक नहीं माने और लडके को अपने साथ ले गए.समय ज्यादा हो गया था। लोग खा के चले गए थे अब राजा की लडिया ही बाकी थी तो लोगो ने कहा के ही लड़का बचा है.इसे आँगन में खाना खिला दो।जब लड़का आँगन में खाना खाने के लिए गया तो । १२ दिन के तीसो बालन खुद चल के आँगन में आ गए और उसका कंधा पकड़ लिए । अब लोदो के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था। राजा बड़ा ही संस्कारी प्रतापी था। वह समझ गया की ये सब भोले की महिमा है। लड़का भी अचम्भे में पद गया। सब पूछने लगे की क्या माजरा है। अब लड़का भी समझ गया था की तब उसने बोला की आप हे राजन ॥ आप अपने लडकियों से पूछे की इन्होने जो नंदवा मैंने भेजा था उसे खा तो नहीं लिया था तब सभी लडकियों ने हां में हां मिला दी॥ तब वह बताया की पानी न मिलाने की वजह से मैंने कैसे इसे रंगा था। तब राजा ने पूछा की आप कहा के रहने वाले हो। तब तक घोड़ा भी पहुच गया सीधे आँगन में घोड़ा बताने लगा की यह भी किसी राजा का लड़का है। उसकी कहानी सुन राजा ने बहुत से धन और दौलत दिया वह राजकुमार अब अपने नगर जाने की जिद करने लगा। और हाथी घोड़े धन दौलत के साथ अपनी तीसो रनिया तीसो बच्चो के साथ रण्वन हो गया । साथ में कुंभार के परिवार को बहुत सी धन दौलत दिया। जब पूरी फ़ौज के साथ वह अपने बाप के नगर में प्रवेश किया और बाग़ में तम्बू गाद दिया।अब राजा को यह बात पता चली की कोई दूसरा राजा बाग़ में तम्बू लगा दिया है। तो उन्होंने सैनिको को भेजा लेकिन सैनिक वापस आ गए और कहने लगे की महाराज वह तो कोई राजकुमार है। जो आप का घोड़ा भाग गया था वह भी साथ में है। अब बिल्ली के ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। रात में ही उसे गंगा मैया ने बताया था की तुम्हारा पुत्र तीस पुरता और रानियों के साथ वापस आ रहा है। अब बिल्ली उछाती कूदती पहुच गयी । तीसो बच्चो के साथ रानियों ने आशीर्वाद लिया॥ राजकुमार ने भी आशीर्वाद लिया। अब बिल्ली ख़ुशी मन से वापस आ गयी । राजा को आश्चर्य हुआ वे भी पैदल बिना सैनिको के साथ पहुच । सबने राजा का पैर छुआ और आशीर्वाद लिए। और आप बीती राजा को बताये राजा को अफ़सोस हुया॥ फिर राजा ने अपने रानियों को फांसी की सजा का हुक्म दिया लेकिन राजकुमार ने कहा वे भी मेरी माता है। उनका उन्हें मिल गया है। वे बिना संतान के है। और पूर्व जनम में भी रहेगी इसलिए हे राजन इन्हें माफ़ कर दिया जाय ॥ राजा ने रानियों को माफ़ कर दिया। और पुत्र बहुए पोतो के साथ महल में आये राजकुमार का राज्यविशेक किये। नगर में उत्सव का माहौल था॥ अब राजा अपनी रानियों को छोड़ करके बिल्ली के साथ तीर४५थ यात्रा पर निकल पड़े॥

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--- संजय सेन सागर

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