Thursday, February 11, 2010

क्यों जाना चाहते हैं राहुल गांधी आजमगढ़?


कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी आजमगढ़ की यात्रा पर जाने वाले हैं। उत्तर प्रदेश के प्रभारी और मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह पार्टी के युवा नेता को आजमगढ़ के कोई 134 साल पुराने नेशनल शिबली कॉलेज ले जाना चाहते हैं। आजमगढ़ देश का ही एक हिस्सा है। अत: वहां की यात्रा करने के लिए हरेक नागरिक स्वतंत्र है। राहुल गांधी अगर वहां जाकर लोगों से बातचीत करना चाहते हैं तो उसमें किसी को कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए। पर राहुल गांधी केवल एक नागरिक भर नहीं हैं। उनकी हैसियत थोड़ी अलग और सामान्य नागरिक से ऊपर है। इसलिए मुंबई की लोकल ट्रेन में सफर करके शिव सेना को खुली चुनौती देने के तत्काल बाद आजमगढ़ जाने के प्रस्ताव पर अपनी स्वीकृति देने के उनके फैसले को एक यात्रा भर से अलग पढ़ा जा सकता है। आजमगढ़ में हाल-फिलहाल ऐसा कुछ नहीं हो रहा है कि राहुल गांधी को वहां की यात्रा करनी चाहिए। इसमें कोई शक नहीं कि दिल्ली के बाटला हाउस में हुई पुलिस मुठभेड़ के बाद से आजमगढ़ का नाम जिस तरह से हवा में उछला है उससे उस शहर की बदनामी होने के साथ-साथ अल्पसंख्यक समुदाय की भावनाओं को भी ठेस पहुंची है। लोकसभा चुनावों के बाद राहुल गांधी ने अब उत्तर प्रदेश को अपने राजनीतिक निशाने पर लिया है। दो साल बाद वहां होने वाले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को सत्ता में काबिज करवाने के राहुल गांधी के प्रयासों के तहत दिग्विजय सिंह उत्तर प्रदेश में राजनीतिक जमीन तैयार कर रहे हैं। राहुल गांधी को आजमगढ़ ले जाने का दिग्विजय सिंह का प्रस्ताव भी इन्हीं प्रयासों का एक हिस्सा है। पर देश के खराब सांप्रदायिक स्वास्थ्य को देखते हुए यह काफी खतरनाक और महंगा इलाज होगा कि- अयोध्या यानी हिन्दू वोट बैंक और आजमगढ़ यानी कि मुस्लिम वोट बैंक स्थापित किया जाए। राहुल गांधी से देश को कुछ अलग तरह की उम्मीदें हैं। उनके फक्कड़पन और चलने-फिरने के अंदाज में अभी तक किसी को यह नजर नहीं आया है कि वे टुकड़ों-टुकड़ों में देश की चिंता कर रहे हैं। शिव सेना की चुनौती को स्वीकार कर मुंबई की यात्रा करने के बाद उनके नंबर ही बढ़े हैं। इससे उन निहत्थे लोगों की ताकत में इजाफा हुआ है जो अभी तक अपने मुंह खोलने से कतरा-घबरा रहे थे। सही पूछा जाए तो मुंबई की लड़ाई आर-पार के दौर में पहुंच रही है। शासन की ताकत ने अगर वहां हथियार नहीं डाले तो हमेशा के लिए स्थापित हो सकता है कि मुंबई और महाराष्ट्र पर सबका हक है। पर किसी समुदाय विशेष का राजनीतिक कारणों से दिल जीतने का राहुल गांधी का प्रयास उनकी मुंबई यात्रा की उपलब्धियों पर पानी भी फेर सकता है। आजमगढ़ से किसी का कोई विरोध नहीं है, होना भी नहीं चाहिए। पर उसके राजनीतिक इस्तेमाल को लेकर अवश्य ही चिंता व्यक्त की जा सकती है। ठाकरे परिवार भी तो आखिर मराठियों को लेकर मुंबई के साथ ऐसा ही कर रहा है। राजनीतिक दलों का शीर्ष नेतृत्व अभी तक देश की जनता को संप्रदायों में बांटकर सत्ता की राजनीति के लिए उसका शोषण करता रहा है। राहुल गांधी चाहें तो इसे अब उलट सकते हैं। देश की नजरें तो इस समय मुंबई पर टिकी हुई हैं कि वहां जनता की जीत होती है या नहीं। राहुल को अपनी आगे की कोई भी राजनीतिकयात्रा मुंबई के फैसले के बाद ही तय करनी चाहिए।
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--- संजय सेन सागर

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