Monday, December 28, 2009

डा श्याम गुप्त के दोहे--

सारांश यहाँ आगे पढ़ें के आगे यहाँ---

कविताई का सत्य--

जिनकी कविता में नहीं ,कोई कथ्य औ तथ्य।
उनकी कविता में कहां, श्याम’ ढूढिये सत्य ॥

तुकबन्दी करते रहें, बिना भाव उद्देश्य ।
देश धर्म ओ सत्य का, नहीं कोई परिप्रेक्ष्य॥

कला कला सौन्दर्य रस, रटते रहें ललाम ।
जन मन के रस भाव का, नही कोई आयाम॥

गूढ शब्द पर्याय बहु, अलन्कार भरमार ।
ज्यों गदही पर झूल हो, रत्न जटित गल हार ॥

कविता वह है जो रहे, सुन्दर सरल सुबोध ।
जन मानस को कर सके, हर्षित प्रखर प्रबोध ॥

अलन्कार रस छन्द सब, उत्तम गहने जान।
काया सच सुन्दर नही, कौन करेगा मान ॥

नारि दर्शना भव्य मन, शुभ्र सुलभ परिधान ।
भाल एक बिन्दी सहज़, सब गहनों की खान ॥

स्वर्ण अलन्क्रत तन जडे, माणिक और पुखराज
भाव कर्म से हीन हो, नारि न सुन्दर साज ॥

भाव प्रबल,भाषा सरल, विषय प्रखर श्रुति -तथ्य ।
जन जन के मन बस सके, कविताई का सत्य ॥








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--- संजय सेन सागर

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