Wednesday, December 23, 2009

स्मृति दीर्घा: संजीव 'सलिल'

स्मृति दीर्घा:

संजीव 'सलिल'

*

स्मृतियों के वातायन से, झाँक रहे हैं लोग...
*
पाला-पोसा खड़ा कर दिया, बिदा हो गए मौन.

मुझमें छिपे हुए हुए है, जैसे भोजन में हो नौन..

चाहा रोक न पाया उनको, खोया है दुर्योग...
*
ठोंक-ठोंक कर खोट निकली, बना दिया इंसान.

शत वन्दन उनको, दी सीख 'न कर मूरख अभिमान'.

पत्थर परस करे पारस का, सुखमय है संयोग...
*
टाँग मार कर कभी गिराया, छुरा पीठ में भोंक.

जिनने अपना धर्म निभाया, उन्नति पथ को रोक.

उन का आभारी, बचाव के सीखे तभी प्रयोग...
*
मुझ अपूर्ण को पूर्ण बनाने, आई तज घर-द्वार.

कैसे बिसराऊँ मैं उनको, वे मेरी सरकार.

मुझसे मुझको ले मुझको दे, मिटा रहीं हर सोग...
*
बिन शर्तों के नाते जोड़े, दिया प्यार निष्काम.

मित्र-सखा मेरे जो उनको सौ-सौ बार सलाम.

दुःख ले, सुख दे, सदा मिटाए मम मानस के रोग...
*
ममता-वात्सल्य के पल, दे नव पीढी ने नित्य.

मुझे बताया नव रचना से थका न अभी अनित्य.

'सलिल' अशुभ पर जयी सदा शुभ, दे तू भी निज योग...
*
स्मृति-दीर्घा में आ-जाकर, गया पीर सब भूल.

यात्रा पूर्ण, नयी यात्रा में साथ फूल कुछ शूल.

लेकर आया नया साल, मिल इसे लगायें भोग...

***********

1 comment:

  1. आपकी स्मृति दीर्घा लांघते हुए कब अपनी दीर्घा में पहुँच गयी पता ही नहीं चला बहुत बधाई इस सुंदर प्रस्तुति

    ReplyDelete

आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

लो क सं घ र्ष !: राजीव यादव की सरकारी हत्या का प्रयास

आजादी के बाद से आज तक के इतिहास में पहली बार भोपाल कारागार से आठ कथित सिमी कार्यकर्ता कैदियों को निकाल कर दस किलोमीटर दूर ईटी  गांव में...