Saturday, December 19, 2009

मेरे मन की आवारगी .............

My Flirting mann
मेरे मन की आवारगी .............
कभी भटकती है शहरों की
अँधेरी रातो में !
तो कभी भटकती है गाँव की
अल्हड़ पगडंडियो में !
मेरे मन की आवारगी .............
कभी भटकती है खुसरो की
रूबाइयो में !
तो कभी भटकती है आजमी की
गज़लों में !
मेरे मन की आवारगी ..............
कभी भटकती है कवि प्रदीप के
गीतों में !
तो कभी भटकती है ख़य्याम की
गज़लों में !
मेरे मन की आवारगी ..............
कभी भटकती है नील गगन के
विस्तृत पटल पर !
तो कभी भटकती है सागर की
तलहटी में !
मेरे मन की आवारगी ...............!

2 comments:

  1. अरे आज तो आपका ये आवारा मन हिंदुस्तान के दर्द की दवा बन गया है इतनी सारी अच्छी पोस्ट एक साथ..............वाह क्या बात है ?

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  2. bahut sunder dhang se aapne apni kavita ko pesh kiyaa....bahut achcha aapke is ghazal ko dekhkar

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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