Wednesday, December 9, 2009

बलामुवा काहे गया परदेश॥

बलामुवा काहे गया परदेश॥
बलामुवा काहे गया परदेश॥
बैरी कोयलिया ताना मारे॥
छोड़ के आपन देश ॥
बलामुवा काहे गया परदेश॥
पशु पक्षी भी हमें चिढावे॥
सासु ननदिया आँख दिखावे॥
इनके बोली तिताऊ लागे॥
ससुरा बदले भेष ॥
बलामुवा काहे गया परदेश॥
उठ भिनौखा बर्तन धोई॥
सपरय नाही काम॥
यह चिक चिक मा बूढी हो गइली॥
कब ई कटे कलेश ॥ बलामुवा काहे गया परदेश॥

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--- संजय सेन सागर