Wednesday, November 4, 2009

हर पवन वेग में छाले है॥

हर नदिया का पानी धूमिल॥
हर पवन वेग में छाले है॥
हर दिल में लालच बसती॥
अब के मनुष्य निराले है॥
मधुर वचन से दस लेते है॥
पर कट जाते है राही के॥
मैसमझ न पाया जीवन लय को॥
मन ढूढ़ रहा हम राही को॥

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--- संजय सेन सागर

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