Tuesday, November 17, 2009

मरो न व्यंग तीर.. जवानी का दोस्तों..

मारो न ब्यंग तीर जवानी का दोस्तों॥
पूछो न घटित घटना कहानी का दोस्तों॥
हम जा रहे अकेले रास्ते में मिली थी॥
उदास चेहरा लेके अकेले ही खड़ी थी॥
आता जो मुशाफिर आँखे टिकाता था॥
मन में खुशी के कुछ गीत गाता था॥
खोलती जुबान न थी रोकती थी होश को॥
मारो न ब्यंग तीर जवानी का दोस्तों॥
पूछो न घटित घटना कहानी का दोस्तों॥
मै जा रहा उधर को मुलाक़ात होगयी॥
चेहरा देखते ही आँखे चार हो गयी॥
सायकिल पर सवार थी हंस करके मैंने बोला॥
क्या बात है हूजुर गमगीन क्यो है ? चोला॥
हमें कही है जाना कुछ छोड़ दो॥
मारो न ब्यंग तीर जवानी का दोस्तों॥
पूछो न घटित घटना कहानी का दोस्तों॥
पीछे नही था साधन आगे उसे बिठाया॥
उत्तर से सायकिल को पूरब की तरफ़ घुमाया॥
जब सिमट करके बैठी चुल-बुली सी मच गयी॥
मानो बदन में मेरे बिजली चमक गयी॥
मजबूर मै बना खोया था जोश को ॥
मारो न ब्यंग तीर जवानी का दोस्तों॥
पूछो न घटित घटना कहानी का दोस्तों॥
गिरा दिया बगल में देखा जब नज़ारा॥
मै बेहोश गिर पडा न चाँद न सितारा॥
पहली बार प्यार का यही एक धक्का लगा॥
ओ कोई नार नही हमें छक्का लगा॥
जेब मेरी साफ़ थी खोया था नोट को॥
मारो न ब्यंग तीर जवानी का दोस्तों॥
पूछो न घटित घटना कहानी का दोस्तों॥

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--- संजय सेन सागर

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