Saturday, November 28, 2009

चीन अमेरिका की मजबूरी पर भारत जरूरी

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की वाशिंगटन-यात्रा के दौरान परमाणु-सौदे को लागू करने की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई लेकिन क्या सिर्फ इसीलिए उनकी इस यात्रा को मात्र् औपचारिकता मान लिया जाए ? क्या यह मान लिया जाए कि ओबामा ने भारत के उन घावों पर सिर्फ मरहम लगाने का काम किया, जो अचानक ही पिछले हफ्ते उनकी चीन यात्र के दौरान उभर आए थे ? जहां तक परमाणु-सौदे का प्रश्न है, स्वयं प्रधानमंत्री ने कहा है कि कुछ ही हफ्तों में सारे मुद्दों पर समझौता हो जाएगा| ओबामा ने भी उनके इस कथन का समर्थन किया है| यह तो हमें पता है कि ओबामा और उनके डेमोक्रेट साथियों ने बुश द्वारा किए गए परमाणु-सौदे के कई प्रावधानों का विरोध किया था और ओबामा प्रशासन परमाणु-अप्रसार का घनघोर समर्थक है| ऐसी हालत में यदि सौदे के कुछ मुद्दों को लेकर दोनों पक्षों के बीच कुछ खींचातानी चल रही है तो यह स्वाभाविक ही है| इसके अलावा सबसे अधिक ध्यातव्य बात यह है कि किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत को पहली बार 'परमाणु शक्ति' कहा है और अगले साल होनेवाले परमाणु अप्रसार सम्मेलन में उससे भाग लेने का आग्रह किया है| यह भारत को छठे परमाणु शस्त्र्संपन्न राष्ट्र के तौर पर मिली अनौपचारिक मान्यता ही है|

भारत के प्रधानमंत्री को ओबामा ने अपना पहला औपचारिक मेहमान बनाया, यह तो उल्लेखनीय है ही, इससे भी बड़ी बात यह है कि दोनों देशों के संबंध अब व्यक्तियों और पार्टियों पर निर्भर न होकर राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच गए हैं| अमेरिका में राष्ट्रपति क्ंलिटन हैं या बुश हैं या ओबामा हैं और भारत में प्रधानमंत्र्ी अटलबिहारी वाजपेयी हैं या मनमोहन सिंह हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता| न ही इस बात से फर्क पड़ता है कि अमेरिका में रिपब्लिकन्स का शासन है या डेमोक्रेटस का और भारत में भाजपाइयों का है या कांग्रेसियों का| रिश्तों का कारवां बराबर आगे बढ़ता चला जा रहा है| इस नए तथ्य को प्रधानमंत्री की इस यात्रा ने रेखांकित किया है|

जहां तक चीन का सवाल है, डॉ. सिंह ने बहुत ही सलीके से ओबामा और अमेरिकियों को समझा दिया है कि दोनों एशियाई देशों में बुनियादी फर्क क्या है ? अर्थशास्त्री होते हुए भी उन्होंने किसी दार्शनिक की तरह पूछ लिया कि क्या सकल राष्ट्रीय आय ही प्रगति का एकमात्र् पैमाना है ? क्या मानव अधिकार, लोकतंत्र् और खुलापन बेकार की बातें हैं ? भारत के ये आदर्श अमेरिका के भी आदर्श हैं| इसीलिए भारत और अमेरिका 'स्वाभाविक मित्र्' हैं| क्या यह कम बड़ी बात है कि ओबामा ने भारत-अमेरिकी संबंधों को 21वीं सदी के भविष्य से जोड़ा है और स्पष्ट शब्दों में कहा है कि 'एशिया के नेतृत्व' में भारत की विशिष्ट भूमिका है| यदि चीन और भारत के बारे में ओबामा द्वारा कही गई बातों की बारीक़ी से तुलना की जाए तो यह रहस्य तुरंत समझ में आ जाएगा कि चीन अमेरिका की मजबूरी है और भारत अमेरिका की पंसद है| अमेरिका पर चीन का 800 बिलियन डॉलर का कज़र् चढ़ा हुआ है, चीन की आर्थिक शक्ति बहुत तेज रफ्तार से बढ़ रही है, सैनिक दृष्टि से भी वह एशिया का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र है और वह सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य भी हैं| ऐसी स्थिति में ओबामा चीन की खुशामद न करें, तो क्या करें ? वे चीन के मुकाबले भारत को क्यों खड़ा करें ? जैसा कि शायद बुश चाहते थे, भारत-चीन-अमेरिका - यह नया त्रिकोण क्यों बने ? भारत चीन से प्रतिस्पर्धा में क्या उलझे ? इसीलिए डॉ. सिंह ने ठीक ही कहा कि वे 'शांतिपूर्ण चीन' के नवोदय का स्वागत करते हैं| वे चीन-अमेरिका संबंधों में अपनी टांग क्यों अड़ाएँ ? लेकिन उन्होंने यह अच्छा किया कि चीन की 'दादागीरी' का खुला जि़क्र कर दिया| यह कम महत्वपूर्ण नहीं कि दोनों देशों के संबंधों को प्रगाढ़ बनाने में अमेरिका में रहनेवाले भारतवंशियों का भी स्पष्ट उल्लेख हुआ| स्वयं ओबामा के प्रशासन में जितने भारतीयों को प्रमुख स्थान मिले हैं, क्या चीनियों को मिले हैं ? ओबामा का हिंदी बोलना, शाकाहारी भोजन परोसना, उनकी पत्नी मिशेल का भारतीय दर्जी से सिला सूट पहनना और हमारे प्रधानमंत्री के सम्मान में इतना बड़ा शामियाना-भोज आयोजित करना क्या विशेष आत्मीयता का परिचायक नहीं है ?

इस आत्मीयता का अर्थ यह नहीं है कि अमेरिका चीन और पाकिस्तान को दरकिनार कर सकता है| ये दोनों राष्ट्र उसकी मजबूरी हैं लेकिन संयुक्त वक्तव्य में अमेरिका ने दो-टूक शब्दों में कहा है कि आतंकवाद की जड़ भारत के अड़ोस-पड़ोस में ही है| दोनों राष्ट्र आतंकवाद को उखाड़ने के लिए कटिबद्घ हैं| यदि आज अमेरिका का गुप्तचर विभाग भारत की सहायता नहीं करता तो क्या मुंबई-कांड के अपराधियों को पकड़ा जा सकता था ? ओबामा ने अफगानिस्तान में भारत की रचनात्मक भूमिका की तारीफ की लेकिन क्या पाकिस्तान के सहयोग के बिना अफगान-संकट का हल हो सकता है ? फिर भी ओबामा प्रशासन के दौरान ही कैरी-लुगार एक्ट पास हुआ है, जिसके तहत पाकिस्तान को मिलनेवाली मदद पर कड़ी नज़र रखी जाएगी ताकि उसका फौजी इस्तेमाल न हो सके| डॉ. मनमोहन सिंह ने वाशिंगटन-यात्र के दौरान भारत के प्रति पाकिस्तानी रवैए का विवेचन भी सही ढंग से कर दिया है| देखना यही है कि पाकिस्तान को पटरी पर लाने में भारत अमेरिका का कितना इस्तेमाल कर पाता है| यदि अमेरिकी दबाव नहीं होता तो क्या पाकिस्तानी अदालतें मुंबई के दोषियों को पकड़तीं ? डॉ. सिंह ने ओबामा को यह सही सलाह दी है कि वे अफगानिस्तान को अधबीच में छोड़कर न भागें लेकिन अगर वे उन्हें अफगान-चक्रव्यूह से निकलने का रास्ता बता पाते तो उनकी हैसियत विश्व-नेता की बन जाती| ओबामा ने भारत और अमेरिकी संबंधों को निरंतर घनिष्टतर बनाने की वकालत की है| दोनों पक्षों ने शिक्षा, कृषि, सुरक्षा, पर्यावरण, व्यापार आदि क्षेत्रें में सहयोग बढ़ाने के लिए छोटे-मोटे कई समझौते किए हैं लेकिन अभी भी कई ऐसी तकनीकें हैं, जिन्हें अमेरिका भारत को देने में संकोच करता है| अभी तक अमेरिका ने भारत को सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाने के बारे में कोई स्पष्ट राय प्रगट नहीं की है| यह ठीक है कि अभी भारत और अमेरिका के रिश्ते उस मुकाम पर नहीं पहुंचे हैं, जिस पर बि्रटेन और अमेरिका के हैं लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री की इस वाशिंगटन-यात्र ने उस मुकाम तक पहुंचने का रास्ता जरूर पक्का किया है|

(लेखक अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विशेषज्ञ है)


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