Monday, November 9, 2009

निज भाषा उन्नति अहै ----डा श्याम गुप्त की कविता ...

सारांश यहाँ आगे पढ़ें के आगे

भारत के दुर्वल मानव ,
दलित आत्मा के पुतले |
मानस सुत रे अंगरेजों के ,
अंगरेजी के कठपुतले |

पढ़कर चार विदेशी अक्षर ,
तुम अपने को भूल चले |
पतन देख कर तेरे मन का,
मेरे मन में शूल चले |

देख बाह्य सौन्दर्य ,विदेशी-
भाषा के गुणगाते हो |
उसे उच्चभाषाकहने
में,
बिल्कुल नहीं लजाते हो |

जीभ नहीं गल गिरती है,
हा! कैसे उसे चलाते हो |
आर महा आर्श्चय ,देश द्रोही -
क्यों नहीं कहाते हो !

तड़प रही है बिकल आत्मा,
भारत की ,कहती निज जन से |
हमें गुलाम बनाने वाले,
अरे! छुड़ाओ इस बंधन से |

यह भाषा ,इसकी सभ्यता ,
समझो भारत का घुन है |
इसे देख मेरी मानवता ,
कहती यों अपना सिर धुन है |

अंगरेजी कुत्सित छायाएं ,
जो भारत से नहीं हटेंगी |
समझें आने वाली पीढी ,
कभी हमको माफ़ करेंगी |

अरे ! मूढ़ ,मति अंध , राष्ट्र द्रोही -
अंत में जाओ भूल |
'निज भाषा उन्नति अहै -
सब उन्नति कौ मूल ' ||



2 comments:

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--- संजय सेन सागर

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