Wednesday, November 4, 2009

भाच्पन कय याद..

जंगल कय हमरे सुंदर छाया॥ काली माई कय अद्भुत माया॥
ऊ नदिया कय सुंदर पानी। सब यारन कय मनमानी॥
लुका-छुपी कय सुंदर खेल॥ सब साथिन कय सच्चा मेल॥
सपने मा कभो देखात नही॥ बचपन कय याद भुलात नही॥
१० साल कय उमर मामा । के हिया गुजार दीं॥
जब नाम लिखाय लीन तीसरे मा पढय म मन लगाय लीन॥
आवय जाय न क कय अक्षर तीसरे म नाम लिखा अहय॥
पढय के खातिर घर से भागी॥ खेलय म मन राम्हा रहय॥
बाबू कय हमरे गाल पे थप्पड़ मन के अन्दर मचलात नही॥
बचपन कय याद भुलात नही॥
भैस चरावय जब जायी रंजीतवा के संग जात रहे॥
अगल -बगल कय भदई ककणी नदिया तीरे खात रहे॥
कौनव घसियारिन जब मिल जाय दुइनव जन रंग जमे देई॥
खैची खुरपा बिथाराय देयी गोरून का घास कहिये देयी॥
उनके हाथे कय फुटहा कंगन मन का हमरे सोहात नही॥
बचपन कय याद भुलात नही॥
अगर केहू गुस्सा म बोले दुनव जन लठ जमाय देयी॥
अगल बगल के गावन म जम के आतंक फैलाय देयी॥
घर के लोगन मुह मोडे बाबू आवय तो जम तोडे॥
ऊ नदिया कय भंगी कय भंगा सब साथिन कय हर हर गंगा॥
हमरे मन से जात नही बचपन कय याद भुलात नही॥

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--- संजय सेन सागर

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