Friday, October 23, 2009

गुलशन kaa दर्द..

गुलशन में खिला गुल॥
गुलशन मुस्कुराने लगा॥
कूडे में देख गुल को ॥
फ़िर गुलशन मुरझाने लगा॥
पछताने लगा अपने पर॥
तब प्रभू की रट लगाता है॥
अपनी दुर्दशा को तब ॥
प्रभू को बताने लगा॥
हंस के प्रभू बोल पड़े॥
तुम धन्य हो महाशय॥
मेरे मन्दिर में तेरी गंध॥
फ़िर से यूं छाने लगा॥

1 comment:

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--- संजय सेन सागर

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