Wednesday, October 7, 2009

कर्म- अकर्म --

कर्म -अकर्म ----

कर्म निम्न प्रकार के होते हैं ---
।- कर्म --जो प्राणी के नित्य-नैमित्तिक कर्म होते हैं , खाना,पीना, सोना ,मैथुन ,सुरक्षा , आदि-आदि जो प्रत्येक जीव करता है , वनस्पति से लेकर मानव तक|
.-सकर्म -जो मूलतः मानव करता है -सामाजिक दायित्व वहन, नागरिक दायित्व ,पारिवारिक दायित्व जो जीवन में आवश्यक हैं |
.-सत्कर्म-जो मानव ,सामान्य कर्मों सेऊपर उठकर , समाज, देश,धर्म ,मानवता के लिए विशिष्ट भाव से करता है जो उसे विशेष व महापुरुषों की श्रेणी में लाता है।
.-कुकर्म या दुष्कर्म --जो मानव को हैवान व पशुतुल्य बनाते हैं ,और मानवता,देश,समाज ,मानव के प्रति अपराध युत होते हैं |
अकर्म --जो व्यर्थ के कर्म होते हैं व मानव को उनसे बचना चाहिए , ये देखने में अहानिकारक होते है सिर्फ़ क्षणिक मनोरंजन कारक ,परन्तु वास्तव में ये समाज के लिए दूरंत-भाव में अत्यन्त हानिकारक व
घातक हैं,
क्योंकि ये व्यक्ति कोअप्रत्यक्ष रूप में कुकर्म करने को प्रेरित करते हैं
,------आजकल टीवी, रेडियो ,मोबाइल आदि पर अत्यधिक मनोरंजन , रेअलिटीशो में बच्चों ,युवकों ,किशोर-किशोरियों को अपने मूल शिक्षा कर्म से भटकाना एक अत्याचार है , स्टंट आदि वाले शो में व्यर्थ के स्टंट जो कभीजीवन में काम नहीं आते, गंदे, वीभत्स , अभक्ष्य पदार्थों में, सर्प -कीडों में मुहं डालने वाले द्रश्य | सीमित ज्ञान वालेलोगों द्वारा सामाजिक आदि विषयों ,तथ्यों पर आधे-अधूरे सत्य , अति-नाटकीयता प्रदर्शन आदि-आदि ; सभी वस्तुतः अकर्म हैं
शासन, जन-सामान्य,विद्वतजन ,संस्थायें , सामाजिक -संस्थायें ,आप और हम सभी को इसके बारे में सोचना चाहिए.

1 comment:

  1. लेख में यथार्थबोध के साथ जागरूकता भी स्पष्ट है।

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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