Sunday, October 4, 2009

दिल की सुनो ..


मै आसमा की बलंदी पर बाराह पहुंचा

मगर नसीब जमी पर उतारलेता है

अमीरे शहर की मुहब्बत से बच के रहो

ये सर से बोझ नही सर उतार लेता है

उसी को मिलता है एजाज भी जमाने में

बहन के सर से जो चादर उतार लेता है

उठा है हाथ तो फिर वार भी जरुरी है

की सांप आँखों में मंजर उतार लेता है

कुंवर समीर शाही

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--- संजय सेन सागर

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