Tuesday, October 6, 2009

मै आशा की बनी निराशा॥

मै आशा की बनी निराशा॥
जो पक्के महल बनाती हूँ॥
अपने हाथो से कस - कस कर॥
फावडे कूदार चलाती हूँ॥
सर पर लेके सीमेंट की बोरी॥
चढ़ जाती हूँ झज्जे पर॥
शाम को वापस आती हूँ जब॥
रोटी बनाती आड्डे पर॥
पीठ पर लादे बच्चे को ॥
छत पर दूध पिलाती हूँ॥
अपने लिए न घर बँगला है॥
न डनलप के मोटे गद्दे॥
लिए चटाई सो लेती हूँ॥
लग जाते मिट्टी अव भद्दे॥
बच्चो को जब सर्द लगे तो॥
लकडी की आग तपाती हूँ॥

3 comments:

  1. shobhna ji is blog pe pahali baar aai hui rachna padhkar man khush ho gaya ,har shabd man ko sparsh karte hai .ati sundar .

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  2. आपकी इस रचना में श्रमिक वर्ग को तरीक़े से पहचानने की कोशिश नज़र आती है।

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  3. आप सभी लोगो को धन्यवाद...

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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