Saturday, October 24, 2009

भिखारी के दशा..

पापी बना है पेट जो॥
दर-दर भटक रहा हूँ॥
छोटी से लेके झोली॥
घर-घर टहल रहा हूँ।
बच्चे है छोटे -छोटे॥
घर में गरीबी चाई॥
लगता है मेरे घर में॥
मौसमी बिमारी आयी॥
जिंदगी में जान कम है॥
फ़िर भी उछल रहा हूँ॥
छोटी से लेके झोली॥
घर-घर टहल रहा हूँ।
रोते बिलखते बच्चे तो॥
आँखे टपक जाती॥
पत्नी की नाजुक हालत॥
रह-रह के हमें रूलाती॥
जिंदगी के ले सवारी॥
सड़को में मटक रहा हूँ॥
छोटी से लेके झोली॥
घर-घर टहल रहा हूँ।

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--- संजय सेन सागर

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