Friday, September 4, 2009

दीप जगमगाये सारी-सारी रात।।

नेह की बाती जली मुस्कायी रात।
दीप जगमगाये सारी-सारी रात।।

रिमझिम फुहार गई वो दूर देश में।
आ गई है ऋतु शरद शीतल भेष में।
पवन मंद-मंद बहे सारी-सारी रात।।

दीपों के संग जलते सभी ही विकार।
जगमग-जगमग देखो लगे है संसार।
मेल-जोल सुन्दर सारी-सारी रात।।

शहर गाँव घर आँगन द्वार-द्वार में।
फुलझड़ियाँ अब नहीं किसी इंतज़ार में।
पल-पल उमंग बढ़े सारी-सारी रात।।

भूलते नहीं बनती ये मोहक रात।
होकर अंधेरी लगे ये उजली रात।
खुशी-खुशी सबसे हो रही मुलाक़ात।।
anshlal pandre

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--- संजय सेन सागर

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