Monday, September 28, 2009

लो क सं घ र्ष !: चिर मौन हो गई भाषा...


द्वयता से क्षिति का रज कण ,
अभिशप्त ग्रहण दिनकर सा
कोरे षृष्टों पर कालिख ,
ज्यों अंकित कलंक हिमकर सा

सम्पूर्ण शून्य को विषमय,
करता है अहम् मनुज का
दर्शन सतरंगी कुण्ठित,
निष्पादन भाव दनुज का


सरिता आँचल में झरने,
अम्बुधि संगम लघु आशा
जीवन, जीवन- घन संचित,
चिर मौन हो गई भाषा

-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल 'राही'

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