Thursday, September 10, 2009

एक बार मेरा कहा मान लीजिये॥

जाते जाते जाते मुलाक़ात कीजिये॥
आखिरी बार मुझको आदाब कीजिये॥
हम जिए तो जिए बस तुम्हारे लिए॥
ये दरख्वास दिल में लिख लीजिये॥
हमने पैगाम भेजा तुमने वापस किया॥
मेरे दिल की आवाज सुन लीजिये॥
तुमने मुझको बुलाया मई दौडा चला आया॥
मेरे प्रशनो का कुछ तो जबाब दीजिये॥
हमने दिल में बसाया तु़मने दिल से हटाया॥
बस एक बार मेरा कहा मान लीजिये॥

2 comments:

  1. भाई जी, श्रन्गार, सौन्दर्य-वर्णन -मर्यादित,कलात्मक-साहित्यिक होना चाहिये; मांसल-दैहिक अनाकर्षक,बेलगाम बोलों की अभिव्यक्ति नहीं ।
    अच्छी-अच्छी श्रन्गारिक रचनाएं पढें और रचना करें।

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  2. डाक्टर साहब सही कविताएं पढ़ने के लिए समय कहा मिलता है॥

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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