Wednesday, September 2, 2009

ग़ज़ल --आशिकी की डोर---

बाद मुद्दतके मिले ,मिले तो ज़नाब ।
गुंचाए -दिल खिले ,खिले तो ज़नाब।

तमन्नाएं , आरजू, चाहतें पूरी हुईं ,
हसरतें -दिले निकलीं,निकलीं तो ज़नाब।

खुदा की मेहर्वानियों की ऐसीबरसात हुई,
सिलसिले मिलने के हुए,हुए तो ज़नाब।

इक नए बहाने से ,तुमने बुलाया हमें ,
बाद मुद्दत के खुले,खुले तो ज़नाब।

कहते थे भूल जाना ,भूल जायेंगे हम भी,
भूले भी खूब, खूब याद आए भी ज़नाब।

अब न वो जोशो-जुनूँ,न वो ख्वाहिशें रहीं,
आना न था फ़िर भी, आए तो ज़नाब ।

आशिकी की ये डोर भी ,कैसी है 'श्याम,
न याद कर पायें उन्हें,न भूल पायें ज़नाब॥

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