Thursday, September 10, 2009

आशा...

बैठे है उनकी राह में ॥
दिल का दिया जलाए॥
शायद ओ चलते जाए॥
शायद ओ वापस आए॥
सारे चमन के फ्हूल को॥
राहो में सजा दिया है॥
सारे जहा की मोतियोंका ॥
मंडप बना दिया है॥
शायद इन्हे ओ देख कर॥
मन ही मन मुस्कुराए॥
चुन चुन के व्यंजनों का॥
पकवान जो बनायी हूँ॥
सोने की थाली में ॥
जेवना जो सजायी हूँ॥
शायद इन्हे वे देख कर॥
एक बार लौट आए॥

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--- संजय सेन सागर

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