Wednesday, August 26, 2009

वह पगली...

सुबह उठ कर मैछत पर जाता तो वह अपनी खिड़की से हमें देखती और मुस्कुराती जब मै सुबह उसे देखता तो हमें उसके होठो की लाली सूरज की लालिमा के समान दिखाती और जब वह हसती थी तो सूरज की किरणे उसकी मुह के अन्दर से हमें आकर्षित कराती॥ जब मै हस देता तो वह हमारे पास आती॥ और मै कहता शुभ प्रभात तो वह यही कहती की आप ही तो मेरे प्रभात है॥ जब मै उसके हाथो को छूटा तो हमें पूरब की हवा के झोके का एहसास होता। और जब उसकी आँखों को देखता तो हमारी तस्वीर जयमाल लिए उसके गले में डालने की कोशिश करता॥ अगर एक दिन के लिए मै कही चला जाता तो उस सुबह वाब छत की तरफ़ न आती और न किसी से बातें करते .जब मै कभी उसे स्पर्श करता तो बादल खुस होते और आकाश गंगा अपनी अम्रत जल से हम लोगो को तृप्त करती । अगर हमें किसी दिन jukhaam जो जाता तो वह हमारे लिए कितने मंदिरों का चक्कर लगाती। वह वही कहती जो मै सोचता ..हमारी khushiyaa उसकी खुशिया थी । वह हमारे जीवन की लकीर थी ॥ लेकिन पता नही किसकी नज़र लगी की ३ साल से उसका॥ कोई अता पता नही वह अपने गाँव चली गई है। और हमारे से उसका संपर्क नही है। वह कैसे होगी पगली॥

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--- संजय सेन सागर

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