Wednesday, July 15, 2009

नवगीत


गीत

आचार्य संजीव 'सलिल'

आपा-धापी,

दौड़ा-भागी,

हाय! यही

अब रही जिंदगी...


राहु-केतु से

रवि-शशि हैराँ।

असत सत्य को

करे परेशां।

दाना पर

हावी हैं नादां-

है बनावटी,

देव-बंदगी...


सदियाँ भोगें

पलों की खता।

नातों से है

नेह लापता।

मन को तन ही

रहा है सता।

घर-घर व्यापी

है दरिंदगी...

***********



No comments:

Post a Comment

आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

लो क सं घ र्ष !: राजीव यादव की सरकारी हत्या का प्रयास

आजादी के बाद से आज तक के इतिहास में पहली बार भोपाल कारागार से आठ कथित सिमी कार्यकर्ता कैदियों को निकाल कर दस किलोमीटर दूर ईटी  गांव में...