Wednesday, July 29, 2009

कितने नेताओं में उमर जैसी ईमानदारी और हिम्मत है



राजेंद्र तिवारी
Editor, Bhaskar websites
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला अपने ऊपर उंगली उठने भर से विचलित हो उठे और मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उमर ने विधानसभा में कहा कि जो झूठा इल्जाम पीडीपी के एक मेंबर ने लगाया है, मेरा मानना है कि मैं तब तक गुनहगार हूं जब तक मुझे बेगुनाह करार नहीं दिया जाता। उन्होंने स्पीकर से कहा कि आप सदन की कार्यवाही से इसे निकाल दें, आप गृह विभाग से इसकी जांच कराएं लेकिन मैं तब तक काम नहीं कर पाऊंगा जब तक मेरी बेगुनाही साबित नहीं हो जाती। मेरे ऊपर एक ऐसा कलंक, एक ऐसा धब्बा लगाया गया है, मैं काम नहीं कर पाऊंगा। उमर सदन से निकले और अपने विधायकों और साथियों की लाख कोशिशों के बावजूद वे नहीं माने और गवर्नर को अपना इस्तीफा सौंप दिया। बाद में उनके राजनीतिक सलाहकार देवेंद्र राना ने उनके इस्तीफा देने की आधिकारिक घोषणा की। यहां ध्यान देने की बात यह है कि यह सेक्स स्कैंडल पीडीपी-कांग्रेस शासन में 2006 में हुआ था।उमर ने राजनीतिक-सार्वजनिक जीवन में शुचिता का एक बड़ा उदाहरण देश के सामने पेश किया है। उमर का यह कदम ऐसी स्थितियों में असाधारण ही माना जाएगा जब देश में केंद्र से लेकर राज्यों तक कुर्सी से चिपके रहने वाले नेताओं की भरमार दिखाई देती हो। चाहें मायावती हों या बुद्धदेब भट्टाचार्य, नरेंद्र मोदी हों या करुणाकरण, लालू यादव हों या मुलायम, कितने नाम लीजिएगा, ऐसे नेताओं से संसद और विधानसभाओं की कुर्सियां भरी हुई हैं। मुझे इंदौर में किसी ने एक किस्सा सुनाया था कि लालबहादुर शास्त्री लोकसभा कैसे पहुंचे थे- पहला लोकसभा चुनाव था। उस समय कांग्रेस पार्टी हर सीट पर एक डमी उम्मीदवार भी रखती थी कि यदि जरूरत पड़ी तो डमी को टिकट दे दिया जाएगा। इलाहाबाद की सीट से लालबहादुर शास्त्री कांग्रेस के डमी उम्मीदवार थे। जो उम्मीदवार था वह नेहरू जी का बहुत खास था। लेकिन इलाहाबाद के एक छोटे से अखबार में उस उम्मीदवार पर भ्रष्ट आचार का आरोप लगाते हुए चार लाइन की खबर छपी। यह खबर नेहरू जी तक पहुंची, नेहरू जी ने उम्मीदवार बदलने का फैसला कर दिया। लोगों ने नेहरू जी को लाख समझाया लेकिन वे नहीं माने और इस तरह से लालबहादुर शास्त्री को टिकट मिल गया। लेकिन आज उसी इलाहाबाद से बड़े-बड़े अपराधी चुनाव लड़ते हैं।मायावती पर आरोप लगें तो लगें वे कुर्सी क्यों छोड़ें। लालूजी पर चाहें जितने मुकदमें चलें, वे सत्ता में बने रहते हैं। गुजरात में नरसंहार हो और नरेंद्र मोदी पर उंगलियां उठें तो क्या। कितने राजनेता हैं आज की तारीख में जो उमर जितनी ईमानदारी, हिम्मत और नैतिक ताकत रखते हैं? देश के हर सूबे, हर हिस्से को ऐसे ही नेतृत्व की जरूरत है लेकिन हमारे महान नेतागण छटंकी भी नहीं है।क्या कहते हैं आप?


भास्कर डॉट कॉम से साभार प्रकाशित

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