Thursday, July 16, 2009

क्या इतनी मै बुरी हूँ॥


लटके पड़े हुए हो॥ क्यो करते रहे इशारा॥
जब पल्लू को मैंने फेका..क्यो कर गए किनारा॥
क्या इतनी मै बुरी हूँ॥ नो नाट नही॥
पल्लू में मेरा दिल था॥ लायी थी छुपा के॥
मम्मी खड़ी थी सामने ..आई दुबक के मै ॥
जब पकडा तुम्हारा दामन..क्यो निकले सटक के॥
क्या इतनी मै बुरी हूँ॥ नो नाट नही॥
मम्मी की मार झेली ॥ पापा की डांटझेली॥
गली गली में चर्चा है..चुटकी लेती सहेली॥
मै आई तुम्हारे डर पे..क्यो सैट के नही खड़े हो॥
क्या इतनी मै बुरी हूँ॥ नो नाट नही॥

3 comments:

  1. third rate kee kavitaa, vaastav men bahut buree hai. men chaahungaa dubaaraa na likhee jaay.

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  2. डाक्टर साहब जी शायद आप को ये कविता पसंद नही आयी ..हो सकता है की हमारी लेखनी कही प्रेम रुपी शव्दों का समावेश कर दिया हो । इस लिए मै यही कोशिश करूगा की दुबारा ऐसी कविता न लिख सकू॥ धन्यवाद॥

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  3. ये बात नहीं,---प्रेम के रंग हज़ार--पर प्रेम न हाट बिकाय। मर्यादित हो,
    इसे ऐसे लिखें---

    सजनि! अब तो प्रणय का वरदान देदो।

    जल उठें मन दीप,ऐसी-
    मदिर मधु मुस्कान देदो।
    अधखुली पलकें झुका कर,
    प्रीति का अनुमान देदो।

    कामिनी! इस मधुर पल को ,
    इक सुखद सा नाम देदो॥

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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