Monday, July 13, 2009

मिटटी के भाव ..अपनी जिंदगी गवा रहे है॥

मिटटी के भाव ..अपनी जिंदगी गवा रहे है॥
इस पवित्र पावन धरती से..रूठ के जा रहे है॥
क्यो करते है आत्म ह्त्या॥
क्या जीने का हक़ नही है॥
मरने के बाद जीने की ॥
तरकीब बता रहे है॥
मिटटी के भाव ..अपनी जिंदगी गवा रहे है॥
इस पवित्र पावन धरती से॥रूठ के जा रहे है॥
क्यो करता है प्रेम धोखा॥
क्यो जलता है परवाना॥
भरी बाज़ार में ॥
मारा जाता है दीवाना॥
अपनी कहानी छोड़ के॥
औरो की बता रहे है...
मिटटी के भाव ..अपनी जिंदगी गवा रहे है॥
इस पवित्र पावन धरती से॥रूठ के जा रहे है॥
क्यो टूटता है प्रेम .मरते है प्रेमी घुट के।
दोनों की खिल्लिया उडाते है लोग जुट के॥
अपनी तो पोल लोग ॥
सबसे छुपा रहे है॥
मिटटी के भाव ..अपनी जिंदगी गवा रहे है॥
इस पवित्र पावन धरती से..रूठ के जा रहे है॥

2 comments:

  1. kehna to bohot kuchh chahtee hun...aawaaz me shamil hona chahtee hun..
    "koyi nahee hai tujhbin Mohan Bharat kaa rakhwala'...Mai yahan "mohan" us mahatma ko kah rahee hun...!

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  2. shama ji ,, bahut sundr ,,,dhanyavaad..

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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