Monday, June 29, 2009

कोई हिंदी पर भी ध्यान दो

दीपिका कुलश्रेष्ठ
Journalist, bhaskar.com


हाल ही में अंग्रेजी भाषा में शब्दों का भंडार 10 लाख की गिनती को पार कर गया पर हमारी मातृभाषा हिंदी का क्या, जिसमें अभी तक मात्र 1 लाख 20 हज़ार शब्द ही हैं। कुछ लोगों का मानना है कि अंग्रेजी भाषा का 10 लाख वां शब्द 'वेब 2.0' एक पब्लिसिटी का हथकंडा है और कुछ नहीं। जो भी हो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि वर्तमान में अंग्रेजी भाषा में सर्वाधिक शब्द हैं।

विभिन्न भाषाओं में शब्द-संख्या

अंग्रेजी- 10,00,000
चीनी- 500,000+
जापानी- 232,000
स्पेनिश- 225,000+
रूसी- 195,000
जर्मन- 185,000
हिंदी- 120,000
फ्रेंच- 100,000
(स्रोत- ग्लोबल लैंग्वेज मॉनिटर 2009)


अंग्रेजी में उन सभी भाषाओं के शब्द शामिल कर लिए जाते हैं जो उनकी आम बोलचाल में आ जाते हैं। लेकिन हिंदी में ऐसा नहीं किया जाता। जब जय हो अंग्रेजी में शामिल हो सकता है, तो फिर हिंदी में या, यप, हैप्पी, बर्थडे आदि जैसे शब्द क्यों नहीं शामिल किए जा सकते? वेबसाइट, लागइन, ईमेल, आईडी, ब्लाग, चैट जैसे न जाने कितने शब्द हैं जो हम हिंदीभाषी अपनी जुबान में शामिल किए हुए हैं लेकिन हिंदी के विद्वान इन शब्दों को हिंदी शब्दकोश में शामिल नहीं करते। कोई भाषा विद्वानों से नहीं आम लोगों से चलती है। यदि ऐसा नहीं होता तो लैटिन और संस्कृत खत्म नहीं होतीं और हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू आदि भाषाएं पनप ही नहीं पातीं। उर्दू तो जबरदस्त उदाहरण है। वही भाषा सशक्त और व्यापक स्वीकार्यता वाली बनी रह पाती है जो नदी की तरह प्रवाहमान होती है अन्यथा वह सूख जाती है
क्या है आपकी राय क्या हिंदी में नए शब्दों को जगह दी जनि चाहिए,अपनी राय कमेंट्स बॉक्स में जाकर दें!

देनिक भास्कर.कॉम से साभार

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7 comments:

  1. हिंदी के मूर्धन्य विद्वानों को अब
    हर एक पूर्वाग्रह छोड़कर आगे बढ़ना चाहिए !
    हिंदी के विकास और प्रचार के लिए यह आवश्यक है !

    शुभकामनायें !

    आज की आवाज

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  2. शुक्रिया इस सार्थक लेख के लिए

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  3. दिपिकाजी
    आप बताईए इन्ह रिश्तो को अग्रेजी मे कैसे सम्बोधित करते है.
    चाचा, चाची, मामा मामी, मॊसा-मोसी, फ़ुफ़ा-फ़ुफ़ि, ताया-ताई, और भी कई शब्द सम्बोधन है जो अग्रेजी मे एकल शब्द है, सब अन्कल- आन्ट, जबकि हिन्दी भाषा मे रिस्तो को भी विभिन्न शब्द सम्भोधन से define किया जा सकता. मेरी जानकारी मे हिन्दि शब्द कोश मे अग्रेजी से ज्यादा है शब्द है
    आभार
    महावीर बी सेमलानी~भारती
    मुम्बई टाईगर
    हे प्रभु यह तेरापन्थ
    हिन्दुस्थान का दर्द

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  4. यह सच है कि अन्गरेज़ी में २६ तथा हिन्दी में ५२ शब्द हैं\ हिन्दी का भाषा भन्डार सन्स्क्रित भाषा से आता रहता है व सम्रद्ध है। भाषा की भाव सम्रद्धता बहुत से शब्दों से नहीं अपितु व्याकरण व लिखने पढने के व्यवहारिक ढन्ग से होती है,जिसमें हिन्दी एक सम्रद्ध भाषा हैं फ़िर भी अन्य भाषा के शब्द अपने बनाकर अपनाने में कोई हानि नही ओर हिन्दी में यह होता है। तमाम अन्ग्रेज़ी,उर्दू ,शब्द हिन्दी में धडल्ले से प्रयोग होते है। आवश्यक नहीं जो अन्गरेज़ी में हो वही हम करें, हमें अपनी आवश्यकतानुसार कार्य करना चाहिये ,नकल नहीं।

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  5. २६ व ५२ वर्ण हैं, शब्द गलत टाइप हुआ है।

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  6. ’किं कर्तव्य विंमूण’ का English translation बता दीजिये तब मानुगां , हिन्दी उनसे पीछे है.
    हम सिर्फ़ एक चीज़ में मार खाते है और वो है हमारा संकोच दूसरी भाषाओं के शब्दो को हिन्दी में आत्मसात करना.
    विचारोतेज्क लेख है ,बधाई.

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  7. प्रिय दीपिका जी!
    वन्दे मातरम.
    हिन्दी में शब्द भंडार कम नहीं है. हिन्दी शब्दों का समृद्ध कोष छापनेवाले नहीं हैं क्योंकि वह बिकेगा नहीं. अंग्रेजी माध्यम से शिक्षित युवा पीढ़ी हिन्दी का प्रयोग नहीं करती. हिन्दी की पुस्तकें नहीं खरीदती. आपको हिन्दी की चिंता करते देखकर विस्मित हूँ. बधाई. आप में हिन्दी की उज्जवल किरण देख रहा हूँ. आप तो पत्रकारिता से जुड़ी हैं. किसी प्रकाशक को तलाश सकें तो ६ माह में २.५ लाख़ से अधिक हिन्दी शब्दों का कोष मैं तैयार कर दूँगा. आपकी जानकारी के लिये यह भी बता दूँ कि १,४०,३०० हिन्दी शब्दों का कोष स्व.कालिका प्रसाद, राजवल्लभ सहाय तथा मुकुंदीलाल श्रीवास्तव द्वारा सम्पादित होकर ज्ञान मंडल वाराणसी द्वारा संवत २००९ (१९५३ईसवी) में प्रकाशित किया जा चुका है. विविध प्रदेशों में प्रचलित आंचलिक बोलियों और विज्ञ की विविध शाखाओं से सम्बंधित शब्दों को जोड़कर हिन्दी में शब्द-संख्या अंग्रेजी से कहीं आगे हो जाएगी. जरूरत इस कार्य के लिये धन तथा प्रकाशन की व्यवस्था की है. प्रयास करिए... शायद पत्रकारिता के माध्यम से यह जुटाया जा सके. सरकार के स्तर पर यह नहीं हो सकेगा. समर्पित लोगों की जरूरत होगी, जो स्वेच्छा से सहयोग करें. गंभीर हों तो विस्तार से चर्चा करें मेरा संपर्क सूत्र निम्न है: आचार्य संजीव 'सलिल' / http://divyanarmada.blogspot.com / salil.sanjiv@gmail.com

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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