Saturday, June 27, 2009

चलता हूं दोस्त...देख लेना


हर दिन की तरह बुधवार को भी मैं अपने दफ्तर में रन डाउन की बगल की अपनी सीट पर बैठा था। अचानक पीछे से किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और पीछे से आवाज आई- अच्छा दोस्त चलता हूं, तड़का के दो सेगमेंट निकल गए हैं, बाकि देख लेना। मैं जब तक पीछे मुड़ता तब तक शैलेन्द्र जी हाथ हिलाते हुए न्यूज रूम से बाहर की तरफ चल पड़े थे। तड़का फिल्मी दुनिया पर हमारे चैनल पर चलनेवाला एक शो है जिसे शैलेन्द्र जी प्रोड्यूस करते थे। उस दिन से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था कि शैलेन्द्र घर जाते वक्त मुझे कहें कि देख लेना। सबकुछ सामान्य ढंग से खत्म हुआ। फाइनल बुलेटिन रोल करने के बाद मैं लगभग एक बजे घर पहुंचा। लगभग ढाई बजे तक रात की पाली के प्रोड्यूसर से सुबह की बुलेटिन की प्लानिंग पर बात होती रही और फिर अखबार आदि पलटने के बाद सो गया।


सुबह साढ़े चार बजे के करीब मोबाइल की घंटी बजी और दफ्तर के एक सहयोगी ने सूचना दी कि नोएडा एक्सप्रेस वे पर शैलेन्द्र जी का एक्सीडेंट हो गया है और वो ग्रेटर नोएडा के शारदा अस्पताल में भर्ती हैं। इस सूचना के बाद दफ्तर में फोन मिलाया तो जानकारी मिली कि रात तकरीबन ढाई बजे शैलेन्द्र जी की गाड़ी की टक्कर ट्रक से हो गई है। टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि उनकी कार ड्राइवर की सीट तक ट्रक के नीचे घुस गई थी। राह चलते लोगों ने जब शैलेन्द्र जी को उनकी कार से निकालकर पास के अस्पताल में पहुंचाया तबतक बहुत देर हो चुकी थी और खून इतना बह चुका था कि उनको बचाना नामुमकिन था। सुबह लगभग साढ़े पांच बजे शैलेन्द्र जी ने अंतिम सांसें लीं। शैलेन्द्र जी की मौत से हम सब लोग स्तब्ध थे और किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था। अस्पताल में जरूरी कागजी कार्रवाई के बाद शैलेन्द्र जी का शव पोस्टमॉर्टम हाउस पहुंचा। लेकिन पोस्टमॉर्टम हाउस में ताला लटका था और पहले से ही तीन शव वहां पोस्टमॉर्टम के इंतजार में रखे थे।


चूंकि पत्रकारों की पूरी बिरादरी वहां मौजूद थी इसलिए नोएडा पुलिस ने पोस्टमॉर्टम हाउस का ताला तो तोड़ डाला लेकिन अंदर के हालात ऐसे नहीं थे कि शैलेन्द्र जी को वहां लिटाया जा सके। सो तय हुआ कि शव को एंबुलेंस में रखा जाए और डॉक्टर को तलाशने के अलावा अन्य सरकारी कागजी कार्रवाई शुरू की जाए। कुछ लोग डॉक्टर को बुलाने में जुटे, तो एक कांस्टेबल पोस्टमॉर्टम के कागजात पर मुख्य चिकित्सा अधिकारी के दस्तखत करवाने रवाना हुआ। दो घंटे बीत चुके थे। धूप तेज होने लगी थी। जरूरी कागजात पर सरकारी अधिकारियों के दस्तखत लेने गया कांस्टेबल लापता हो चुका था। इंस्पेक्टर विनय राय उसको फोन लगाकर परेशान, लेकिन फोन पहुंच से बाहर। घंटेभर बाद कांस्टेबल नमूदार तो हुआ लेकिन अब कागजात थे लेकिन डॉक्टर नहीं। आधे घंटे बाद डॉक्टर आए और अगले बीस-पच्चीस मिनट में पोस्टमॉर्टम की प्रक्रिया खत्म हो गई। तपती गर्मी में पोस्टमॉर्टम के लिए तीन से चार घंटे का इंतजार। ये हाल उत्तर प्रदेश के सबसे विकसित शहर नोएडा का था तो और शहरों में क्या स्थिति होगी इसकी कल्पना मात्र से रूह कांप जाती है। ये एक ऐसी संवेदनहीन व्यवस्था का बदसूरत चेहरा था जो हर दिन दुखी परिवार को मुंह चिढ़ाता है।


अव्यवस्था का आलम ये कि शव को रखने का कोई इंतजाम नहीं। ना ही साफ-सफाई और ना ही शव को सुरक्षित रखने के कोई उपकरण या फिर बर्फ का ही इंतजाम। संवेदनहीनता इतनी कि डॉक्टर को देर से आने का मलाल नहीं, वो तो पत्रकारों की वजह से थोड़ा जल्दी यानि लगभग घंटेभर पहले पहुंचा था। पोस्टमॉर्टम होने के बाद शैलेन्द्र जी के शव को कैलाश अस्पताल के शवगृह में रखवा दिया गया। तय ये हुआ कि जब उनके रिश्तेदार आ जाएंगे तो शुक्रवार की सुबह निगमबोध घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।


शाम को जब दफ्तर पहुंचा तो वहां अजीब सी मुर्दनी छाई थी। सबके चेहरे पर गहरे अवसाद को साफ तौर पर परलक्षित किया जा सकता था। मैं अपनी सीट पर बैठा था। पीछे से शैलेन्द्र जी की ओबिच्युरी तैयार होने की आवाजें आ रही थीं। जो ये स्टोरी कटवा रहा था उसने बताया कि पैकेज का वॉयस ओवर करने वाले साथी फफक-फफक कर रो रहे थे। दफ्तर में अजीब सा माहौल था। सब एक-दूसरे को देख रहे थे और अपना गम छुपाने की कोशिश भी कर रहे थे। अचानक से मेरे सीनियर मेरे पास आए और मुझसे कहा कि शैलेन्द्र को हेडलाइन में ले लीजिए। ये वाक्य ऐसा था जिसे सुनकर मन अंदर तक कांप गया। कल तो जो हमारे साथ बैठा करते थे आज उनपर हेडलाइन लिखनी पड़ेगी। मन बेचैन था, कंप्यूटर खुला था, पांच बजने में कुछ मिनट रह गए थे, मुझे शैलेन्द्र जी को हेडलाइन में लेना था। घड़ी की सुई बढ़ती जा रही थीं, हाथ को जैसे लकवा मार गया था। नहीं रहे शैलेन्द्र जी - के बाद लिखने के लिए शब्द नहीं सूझ रहे थे।


इस बीच हमारे संपादक आशुतोष मेरे पास आए और मेरा हौसला बढ़ाने लगे। किसी तरह से शैलेन्द्र जी पर हेडलाइन भी लिखी, उनपर बुलेटिन भी प्लान किया और जब पहली बार उनकी ना रहने की खबर बुलेटिन में चली तो पूरे न्यूजरूम में सन्नाटा और उसको चीरती हुई सिसकियां सुनाई दे रही थीं। ये हमारे पेशे की एक ऐसी विडंबना है जिसपर हम सिर्फ रो सकते हैं, रुक नहीं सकते। क्योंकि चाहे जो हो जाए बुलेटिन नहीं रुक सकता।

शुक्रवार को हमलोग उनके अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के निगम बोध घाट पहुंचे। स्नानादि करवा कर जब मंत्रोच्चार के बीच शैलेन्द्र जी के पार्थिव शरीर को चिता पर रखा जा चुका था। मैं किसी काम से ऊपर चला गया था और जब वापस घाट पर लौट रहा था तो देखा दो तीन लोग शैलेन्द्र जी के छह साल के छोटे बेटे को सफेद कुर्ता पायजामा पहनाने और बाल काटने पर आमादा थे। और वो मासूम बच्चा जो अबतक ये नहीं समझ पाया था कि उसको बेहद प्यार करने और उसकी हर ख्वाहिश पूरी करने वाला उसका पापा इस दुनिया से जा चुका है, उसको अपने पिता को मुखाग्नि देने के लिए तैयार किया जा रहा था। और वो कह रहा था कि मैं क्यूं बदलूं कपड़े, मैंने तो अच्छी जींस पहन रखी है, मुझे नहीं पहनना कुर्ता-पायजामा, मुझे नहीं कटवाने अपने बाल। वो रो रहा था और कुछ लोग उसके साथ जबरदस्ती तो कुछ प्यार मनुहार कर रहे थे।


सदमे में मैं नीचे आया और अपने वरिष्ठ सहयोगी प्रबल जी और संजीव को कहा कि उस बच्चे के साथ जो हो रहा है उसको रोकिए। दोनों ने धर्म के नाम पर हो रहे इस कर्मकांड को रोकने की भरसक कोशिश की लेकिन वहां मौजूद एक व्यक्ति ने लगभग चीखते हुए कहा कि हिंदू मायथालॉजी में बेटा इसलिए पैदा किया जाता है कि वो अपने पिता को मुखाग्नि दे सके। विरोध का स्वर भी तीखा था लेकिन समाज के कुछ धर्मभीरू लोग डटे थे। बीच का रास्ता निकाला गया और बच्चे को सिर्फ सफेद कुर्ता पहनाकर चिता का स्पर्श करवा दिया गया।


शैलेन्द्र जी की मौत ने एक बार फिर से धर्म के नाम पर खेल खेलने वालों को बेनकाब किया। हिंदू धर्म और उसके ग्रंथों को व्याख्यायित कर हर रोज धर्म पर कार्यक्रम बनाने वाले शैलेन्द्र जी ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि उनके प्यारे बेटे के साथ धर्म के नाम पर उनके ही रिश्तेदार संवेदनहीनता की पराकाष्ठा पार कर जाएंगे। शैलेन्द्र जी आपके धर्म का तो ये मतलब नहीं ही रहा होगा। हिंदू धर्म के नाम पर अनपढ़ लोग हमेशा कुछ ऐसा कर गुजरते हैं जिससे धर्म में हमारे जैसे लोगों की आस्था जरा कम हो जाती है। आज जब मैं अपनी उसी सीट पर बैठकर शैलेन्द्र जी के निधन के बहाने संवेदनहीन व्यवस्था और अत्याचारी धार्मिक कर्मकांड पर लिख रहा हूं तो लगता है कि शायद पीछे से फिर शैलेन्द्र जी आकर कंधे पर हाथ रखेंगे और कहेंगे -चलता हूं दोस्त, देख लेना।

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2 comments:

  1. divangat ko hamari shraddhanjali...........bahut hi marmsparshi vyatha hai jo kahte banti hai aur na chup rahte.hamari samvednayein aapke sath hain.

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  2. वास्तव में ये अनावश्यक क्रियायें समाप्त होनी चाहिये। यह सब कोई समाज़ या सन्स्था या पेशेवर लोग, डाक्टर आदि की सम्वेदन्हीनता नहीं है,न वे कुछ कर पायेंगे। यह मानव मात्र की ,,हमारी अपनी,, सम्वेदन्हीनता है। जब तक मनुष्य अर्थात हम स्वयम नहीं बदलेंगे कुछ नहीं होगा। जब हम पर पडती है तो हम चिल्लाते हैं, नहीं तो- ये उनके घर का मामला है,हमें क्या ?- यह भावना बदलनी चाहिये।

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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