Saturday, June 6, 2009

जिंदगी को सुरीला और नशीला बनाएँ!!


इस बार सुखनसाज ब्लॉग की चर्चा कर रहे है रवींद्र व्यास जी,जिसे हम वेबदुनिया से साभार यहाँ प्रकाशित कर रहे है

यह एक सुरीला ब्लॉग है। यह एक नशीला ब्लॉग है। सुरीला इसलिए है कि यहाँ एक से एक फ़नकारों की महफिल सजी हैं। अपनी पुरकशिश और पुरनम आवाज़ के साथ। अपनी ही लय में मगन, सुनने वालों को भी मगन करती हुई। अपनी कलाकारी और गलाकारी के साथ। ये आवाज़ इतनी साफ है जैसे मीठे झील के पानी में आप अपनी आत्मा की झलक देख सकते हैं।


ये आवाज़ें इतनी महीन हैं कि इसमे कायनात की धीमी से धीमी आवाज सुनी जा सकती है। जैसे दिल टूटने की आवाज़ या फिर ओस की तरह टपकते आँसू की आवाज़। या विरह में किसी की आह की आवाज़। और यह नशीला इसलिए है कि यहाँ एक से एक आला दर्जे के शायरों का अंदाजे बयां हैं। दिल की बातें हैं, चाँद की बातें हैं, जुल्फों और रात की बातें हैं। मिलन की और विरह की बातें हैं। इश्क में फना हो जाने की और खुदा हो जाने की बाते हैं। यहाँ नाजुक खयाल हैं, बहते जज्बात हैं। दिल से निकली बातें हैं, दिल में उतरती बातें हैं।


यह सुखनसाज़ ब्लॉग है। यह सिर्फ ग़ज़लों का ब्लॉग है। यहाँ ग़ज़लें पढ़ीं भी जा सकती हैं और सुनी भी जा सकती हैं। ये इतनी सुरीली औऱ नशीली हैं कि आप बस खो जाएँ। सब भूल जाएँ। बस एक रूहानी सुकून यहाँ मिलेगा। जैसे जलते ज़ख्म पर किसी ने रूई का फाहा रख दिया हो। जैसे जलते बुखार में किसी ने ठंडे पानी की पट्टी रख दी हो।


जैसे भटकती रूह को किसी ने एक मुलायम पनाह दे दी हो। जैसे डूबते दिल को किसी ने नाजुक निगाह से थाम लिया हो। इस ब्लॉग को चार संगीतप्रेमी संचालित करते हैं-अशोक पांडे, यूनुस, मीत और संजय पटेल। ये चारों मिलकर हमारे जीवन की कर्कशता को थोड़ा कम करते हैं। चीखों और चिल्लाहटों से थोड़ा दूर ले जाते हैं। और जिंदगी को सुरीला और नशीला बनाते हैं।


यहाँ आपको मीर तकी मीर से गालिब का अंदाजे बयां मिलेगा। उनकी चुनिंदा ग़ज़लें मिलेंगी। फैज़ अहमद फैज़ की ग़ज़लें-नज़्में मिलेंगी तो अहमद फराज़ की नई जमीन पर कही गई ग़ज़लें भी मिलेंगी। नासिम काज़मी से लेकर अहमद नदीम काज़मी की चुनी हुई ग़ज़लें मिलेंगी।


यहाँ शायरों के बारे में बहुत ही आत्मीय ढंग से जानकारियाँ भी हैं। और इन तमाम शायरों को ये ग़ज़लें अज़ीम फ़नकारों की आवाज़ों में सुनने को मिलेंगी। यहाँ हाल ही में इस दुनिया से रुख़सत हुईं पाकिस्तानी गायिका इक़बाल बानो की आवाज में ग़ज़लें सुनी जा सकती हैं तो बेगम अख्तर की आवाज में ग़ज़ल का नशा चढ़ता महसूस किया जा सकता है। यहाँ शास्त्रीय गायिका शोभा गुर्टू हैं तो आबिदा परवीन भी। और हाँ मल्लिका पुखराज भी हैं। मेहंदी हसन हैं तो जगजीत सिंह भी और अहमद हुसैन मोहम्मद हुसैन भी हैं।


आशा भोंसले से लेकर मोहम्मद रफी और तलत महमूद की आवाज में भी ग़ज़लें सुनी जा सकती हैं। अहमद फराज़ के निधन पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए एक पोस्ट में कहा गया है कि वे अपनी ज़िन्दगी में शायरी का एक ऐसा मरकज़ बन गए थे जहाँ तक पहुँच पाना दीगर लोगों के लिए नामुमकिन सा लगता है। मैंने बार बार लिखा भी है कि रंजिशे ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ, इस एक ग़ज़ल को मैं ग्लोबल ग़ज़ल ही कहता हूँ।


फ़राज़ साहब ने मुशायरों में होने वाली राजनीति के चलते स्टेज से हमेशा एक मुसल्सल दूरी बनाए रखी। जैसा कि होना चाहिए अदब की दुनिया के अलावा समाज और इंसानियत के हक़ में शायर और अदीब खड़े नज़र आने चाहिए सो फ़राज़ साहब हमेशा कमिटेड रहे।


जाहिर है, सत्ता से उनकी कभी नहीं बनी। भारत-पाकिस्तान की एकता और तहज़ीब के हवाले से अमन और भाईचारे की ख़िदमत उनकी ज़िन्दगी के उसूलों में शुमार रहा। बिला शक़ कहा जा सकता है कि फ़राज़ साहब के परिदृश्य पर लोकप्रिय होने के बाद ग़ज़ल को एक नया मेयार मिला। मौसीक़ी की दुनिया ने हमेशा उनकी ग़ज़लों का ख़ैरमक्दम किया और जिस तरह की मुहब्बत और बेक़रारी उनके कलाम के लिए देखी जाती रही वह किसी शायर को नसीब से ही मिलती है। इसके साथ ही उनकी एक मशहूर ग़ज़ल भी दी गई । आप भी मजा लीजिए-


ज़िन्दगी से यही गिला है मुझे
तू बहुत देर से मिला है
तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल
हार जाने का हौसला हैं मुझे
दिल धड़कता नहीं तपकता है
कल जो ख़्वाहिश थी आबला है मुझे

हमसफ़र चाहिए हुजूम नहीं
इक मुसाफ़िर भी क़ाफ़िला है मुझे

जाहिर है यहाँ ग़ज़लों को पढ़ने, सुनने का मजा है। आप भी सुनिए। और जिंदगी को कुछ और सुरीला बना लीजिए। ये रहा इसका पता-

आगे पढ़ें के आगे यहाँ

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--- संजय सेन सागर

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