Saturday, May 2, 2009

Loksangharsha: बाजार बहुत है ..



भाषा भाव छंद तो फ़नकार बहुत है
तुलसी- कबीर- सूर के आधार बहुत है
तेरी खुदी को तेरा खुदा मिल ही जाएगा-
इन्सान बिकना चाहे तो बाजार बहुत है

आंसू की होती मुस्कान की भाषा
आँखों की दिलो की नेह पहचान की भाषा
हिन्दी नही उर्दू नही वरन इंतना समझिये -
घर दिल में बना ले वह इन्सान की भाषा

चाह होगी तो कोशिशे होंगी
प्यार होगा तो रंजिशें होगी
स्वार्थ होगा दोस्ती होगी-
प्राण होंगे तो बंदिशे होंगी

पुण्य है ,पाप है , कर्म फल है यही
जन्म है, मृत्यु है , गम विजय है यही
आदमी का बुढापा बताता हमे -
स्वर्ग भी है यही नर्क भी है यहीं।।

-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल' राही '

4 comments:

  1. bahut hi gahri rachna likh di .

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  2. मैं इसे आपको अब तक की सबसे खूबसूरत नज्म कह सकता हूँ
    बहुत खूब !

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  3. मैं इसे आपको अब तक की सबसे खूबसूरत नज्म कह सकता हूँ
    बहुत खूब !

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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