Thursday, May 7, 2009

कुन्डली छन्द----छवि कदम्ब के ब्रक्ष की--राधा के घर के सम्मु ख कदम्ब का तरु ख वन्शी-वट--बरसाना ,मथुरा,मथुरा

   

पुष्पों    की   वर्षा करें,   राधा पर   घन- श्याम,
छवि कदम्ब के ब्रिक्ष की सुलसित ,ललित ललाम ।
सुलसित  ललित  ललाम,    गोप गोपी हरषायें,
ललिता, कुसुमा ्,राधाजी, मन अति सुख पायें।
विह्वल भाव वश,देव दनुज किन्नर नर नागर ,
करें  पुष्प- वर्षा  ्राधा  पर ,  नट्वर- नागर ॥

राधाजी के   अन्ग को,  परसें  पुष्प  लजायं,
भाव विह्वल हो नमन कर ,सादर पग गिरि जायं।
सादर पग गिरि जायं,लखि चरण शोभा न्यारी ,
धन्य-धन्य हें पुष्प,  श्याम- लीला बलिहारी  ,
तरु कदम्ब हरषायं,देखि ुगुन कान्हा जी के,
क्रीडा करते श्याम, ’श्याम ’ सन्ग राधाजी के॥
                                   -डा श्याम गुप्त

3 comments:

  1. श्याम जी आपकी कविता बहुत बहुत सुंदर है. आप ऐसी और कवितायेँ लिखें.
    आभार और धन्यवाद.

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  2. श्याम जी आपकी कविता बहुत बहुत सुंदर है. आप ऐसी और कवितायेँ लिखें.
    आभार और धन्यवाद.

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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