Wednesday, May 20, 2009

वक्त हालात और मैं

वक्त कुछ इस तरह मेहरबान गया
आंधियां आती गई मैं आशियाँ होता गया
सीखा न था जब चेह्चाहाता था बहुत
ढल गया अल्फाज़ में तो बेजुबान होता गया
ढूंढ लेता था अंधेरों में भी अपने आपको
पर उजालो से मिला तो बदगुमान होता गया
जब किया था कैद उसे था बहुत बाकी मगर
रफ्ता रफ्ता वोह परिंदा हम जुबां होता गया
आँधियों के साथ ऊंचा कुछ दिनों वो क्या उड़ा
गर्द का राह था लेकिन आसमान तो होता गया

No comments:

Post a Comment

आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

लो क सं घ र्ष !: राजीव यादव की सरकारी हत्या का प्रयास

आजादी के बाद से आज तक के इतिहास में पहली बार भोपाल कारागार से आठ कथित सिमी कार्यकर्ता कैदियों को निकाल कर दस किलोमीटर दूर ईटी  गांव में...