Tuesday, May 5, 2009

ग़ज़ल


जो समझते ही नही वक्त की कीमत क्या है
उनको एहसास दिलाने की ज़रूरत क्या है
तुम ही बतलाओ सरे राह ये चलते चलते
नाजो अंदाज़ दिखाने की यह आदत क्या है
बेचकर अपनी अना पूछ रहे हो हमसे
शर्म क्या है यह हया क्या है नदामत क्या है
भाई भाई का यहा हो गया दुश्मन कैसे
कोई बतलाये तो आख़िर यह सियासत क्या है
बाखुदा कोई नही पूछने वाला दिल से
उसके हाथों में यह पैगामे मसर्रत क्या है

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--- संजय सेन सागर

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