Friday, May 1, 2009

चंद अशआर : रात आचार्य संजीव 'सलिल'

पाक दामन दिख रहे हैं, दिन में हम भी दोस्तों।
रात का मत ज़िक्र करना, क्या पता कैसे-कहाँ?

पाक दामन दिख रहे हैं दिन में वो भी दोस्तों।
रात भी शर्मा के जिनसे, दिनमें दिखती है नहीं।

सागरों-मीना 'सलिल' को दिन में छू पाते नहीं।
रात हो, बरसात हो तो कोई क्यों इनसे बचे?

रात की बात ही निराली है।
उजली सूरत भी लगे काली है॥

अँधेरा जितना घना हो रात में।
सुबह उतनी खूबसूरत हो 'सलिल'॥

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2 comments:

  1. बहुत प्‍यारे अशआर हैं, और पहला तो कमाल का है।

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    TSALIIM
    SBAI

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  2. बहुत खूब ............ शानदार और जानदार

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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