Sunday, May 17, 2009

एक त्रिपदा -अगीत ग़ज़ल --

लाख बद्दुआएं दीं दिल से
बहुत चाहा न चाहें दिल से ;
पर न निकल पाये वो दिल से ।

सोचा चले जायं महफ़िल से ,
यह न होगा अब तो दिल से ;
बुलाया जो आपने दिल से ।

अब महफ़िल से जाएँ कैसे ,
बिना दीदार जाएँ कैसे;
सदायें दीं आपने दिल से ।

लाख दुआ करे दुनिया,
मन्नतें माने श्याम, दुनिया;
न निकल पायें आपके दिल से। ।

1 comment:

  1. श्याम जी
    नमस्कार
    आपके त्रिपदा पढ़े
    अच्छा लगा.

    लाख दुआएँ दीं दिल से
    बहुत चाहा, न चाहें दिल से.
    पर न निकल पाए वो दिल से.
    - विजय

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--- संजय सेन सागर

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