Friday, May 1, 2009

हे जयेष्ट राज ठंडे पड़ जाओ।

हे जयेष्ट राज ठंडे पड़ जाओ।
अपनी घमस से न तड़पाओ॥
हुआ आगमन जैसे ही तेरा।
नदी तालाब सब लिए बसेरा॥
पानी की किल्लत मच जाती।
रगड़ झगड़ चाकू चल जाती॥
सूख रही कंचन से बगिया।
रास न आए रसिक की बतिया॥
तन से गिरे नीर की लारी।
बिन पानी क्या सीचे माली॥
जीव जंतु सब ब्याकुल सब ठाढे।
पानी दे दो ऊँट भी मांगे॥
नई सुहागिन कोठारी में सोये।
तेरी तड़प से मन में रोये॥
ज्येष्ठ राज़ अब शर्म तो कीजे।
खड़ी बहू है कर्म तो कीजे॥
नई नवेली ब्याह के आई
खुशिया का संसार है लायी॥
इस आँगन की शोभा अद्भुत
त्याग के आई है वह सब कुछ
बारह ब्यंजन बना के लायी
जो नई नवेली दुल्हन आई॥
साजन के बिया प्यार से खाओ....
हे जयेष्ट राज ठंडे पड़ जाओ।
अपनी घमस से न तड़पाओ॥

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--- संजय सेन सागर

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