Tuesday, April 14, 2009

A STUPID COMMON MAN और जूता


बिहार के बक्सर संसदीय क्षेत्र का एक गाँव जहाँ मनमोहन और सुशासन बाबु के दावों की कलई खुलती नज़र आती है । बिजली -पानी-सड़क -शिक्षा-रोजगार जैसी आधारभूत जरूरते अधूरी है । बार-बार वादे ! हर बार नए -नए नारे ! आख़िर वादाखिलाफी से तंग आकर उनका गुस्स्सा फूट पड़ा । लोगों से वोट मांगने पहुंचे बाहुबली ददन पहलवान का स्वागत मतदाताओं ने जूते-चप्पलो से किया । कल तक छाती तान कर वोट मांगने वाले बाहुबली ददन भी विरोध के इस ब्रह्मास्त्र से सहमे नजर आए ।

जी हाँ ," जूता " आज पुरे विश्व में विरोध का प्रतिक बन गया है । भारत में अरुंधती राय पर "युवा "(yuva) ने चप्पल क्या फेंका , नेताओ को जुतियाने का सिलसिला ही चल पड़ा । चिदंबरम के बाद नवीन जिंदल पर जूता चलते ही सारा चुनावी माहौल जुतामय हो गया । हर रोज कहीं न कहीं नेताओ की चुनावी सभा में जूतों की बारिश हो रही है ।

'विरोध' लोकतंत्र के लिए प्राणवायु का काम करता है । विरोध को अगर सम्मान न मिले तो लोकतंत्र को मृत समझा जाना चाहिए । हमारे यहाँ तो सम्मान की यह भावना कब की दम तोड़ चुकी है । विरोध के सारे संस्थानों को हाइजैक किया जा चुका है। पटना का हड़ताली चौंक हो या दिल्ली का जंतर-मंतर हजारों लोग जुलुस लेकर चीखते-चिल्लाते हैं और चले जाते हैं । कहीं कोई सुनने वाला नही ! नतीजा वही ढाक के तीन पात ! राजधानी में विरोध का , अपनी बात कहने का एक और संस्थान पिकनिक प्लेस में तब्दील हो चुका है । किसी साधारण आदमी के बस की बात नही कि वो यहाँ बुकिंग कर सके । कभी जन- आन्दोलनों की दिशा तय करने वाले जगहों पर आज बड़े- बड़े नेताओं की टेबल पॉलिटिक्स होती है । एक आम आदमी "{ A STUPID COMMON MAN }" क्या करे , कहाँ अपना विरोध दर्ज करे ? है कोई जवाब उनके पास जो' जूते' को विरोध का हथियार मानने से इंकार करते हैं ? आप असहमत हो सकते हैं पर, आम आदमी की मजबूरी को समझिये । सेलिब्रिटी , क्राइम और क्रिकेट के सहारे चल रही मीडिया में ख़ुद की आवाज पहुँचाना सहज नही है । तब आप लोगों को कोई ऐतराज़ नही हुआ जब , विरोध के लिए चड्डियों और कंडोम का सहारा लिया गया ? आपके हिसाब से तो इन्हे जंतर -मंतर पर चिल्लम -चिल्ली करनी चाहिए थी । लेकिन क्या इनकी आवाज़ आप तक पहुँचती ?एक ज़माने में गाँधी मीडिया के हीरो थे , उनका छोटा से छोटा कार्यक्रम तत्कालीन मीडिया की सुर्खियाँ बटोर ले जाता था ।उनके एक -एक वाक्य अख़बारों की लीड बन जाते थे । ऐसे समय में भगत सिंह को अपनी आवाज़ की गूँज सुनाने के लिए बम फोड़ने का हिंसक काम करना पड़ा था । एक आम आदमी कोई राहुल गाँधी तो हैं नही ! जो जरा सी छींक आने पर इनकी आवाज़ जनता तक पहुँच सके । राहुल कलावती के घर जाते हैं तो सारे देश को पता चल जाता है लेकिन इसी देश के दस करोड़ वानवासिओं के लिए एकल विद्यालय चलाने वाले के ० एन ० राघवन को कोई नही जनता ! ऐसे में विरोध का तरीका तो नया और मीडिया मसाला के हिसाब से ही होना चाहिए । फिलवक्त , जो भी हो विरोध के सारे तरीको पर जूता फेंकना भारी पड़ता दिख रहा है । चंद युवाओं की मुहीम करोडों लोगों के लिए रामबाण साबित हो रहा है । आगे-आगे देखिये होता है क्या ?

10 comments:

  1. सुन्दर लिखा है
    इसी तरह लिखते रहिये

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  2. हम दोनों मिल के देखते है क्या होता है !

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  3. बहुत बहुत शुक्रिया !
    आपने बहुत ही खुबसूरत रूप से विस्तार किया है ! आप की हर एक कहानी और कविता लाजवाब है!

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  4. babli ji samjha nahi ye kaisa comment hai ? kahani to maine likha hi nahi ............ ye sahity nahi rajnaitik mudda hai behtar hoga yadi aap sabhi apni ray sambandhit mudede par de

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  5. देखकर पहली बार ऐसा लगा की कोई अच्चा ब्लॉग पढ़ रहा हूँ, लिकते रहो हम आपके साथ हैं.

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  6. बढ़िया लेखन
    इसी तरह आगे अग्रसर हो
    यही सुभकामना है !

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  7. जयराम जी बबली जी की बात अपनी समझ से भी बड़ी निकली यार

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  8. जयराम जी आपका यह लेख मैं देर से पड़ सका और इसे आपने इतनी खूबसूरती से लिखा है की मुझे मजबूरन सबसे ऊपर लगाना पढ़ा !
    आप इसी तरह अपना सहयोग हम तक पहुंचाते रहेंगे यही आशा है !
    जय हिन्दुस्तान-जय यंगिस्तान

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  9. संजय जी और तमाम ब्लॉगर मित्रों ,
    मैं लेखन थोथी प्रशंसा पाने के लिए नहीं करता हूँ .
    मेरे लेखन का उद्देश्य सार्थक मुद्दों पर बहस के जरिये जागरूकता पैदा करना है .
    मैं कोई व्यावसायिक पत्रकार नहीं बल्कि राजनैतिक और सामाजिक कार्यकर्त्ता हूँ . और पत्रकारिता को क्रांति का हथियार मानता हूँ .
    इतना सब कहने का मतलब कि पोस्ट पर टिप्पणी करते समय कृपा कर सम्बंधित मुद्दे का ध्यान रखें और केवल दिखावटी तारीफ न करें .
    मसलन , कुछ टिप्पणी जैसे - अच्छा लिखा है, बहुत अच्छा लिखा है, बढ़िया लेखन , शुभकामनाये , आदि . इनसे ऐसा लगता है कि बस बगैर पढ़े कुछ भी लिख दो और चलते बनो . जरा मेरी बात को अन्यथा नहीं लेंगे .
    --

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  10. संजय जी और तमाम ब्लॉगर मित्रों ,
    मैं लेखन थोथी प्रशंसा पाने के लिए नहीं करता हूँ .
    मेरे लेखन का उद्देश्य सार्थक मुद्दों पर बहस के जरिये जागरूकता पैदा करना है .
    मैं कोई व्यावसायिक पत्रकार नहीं बल्कि राजनैतिक और सामाजिक कार्यकर्त्ता हूँ . और पत्रकारिता को क्रांति का हथियार मानता हूँ .
    इतना सब कहने का मतलब कि पोस्ट पर टिप्पणी करते समय कृपा कर सम्बंधित मुद्दे का ध्यान रखें और केवल दिखावटी तारीफ न करें .
    मसलन , कुछ टिप्पणी जैसे - अच्छा लिखा है, बहुत अच्छा लिखा है, बढ़िया लेखन , शुभकामनाये , आदि . इनसे ऐसा लगता है कि बस बगैर पढ़े कुछ भी लिख दो और चलते बनो . जरा मेरी बात को अन्यथा नहीं लेंगे .
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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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