Thursday, April 2, 2009

Mai tanha hu

मैं तनहा हु महफिल में जो तू जो नही मेरे संग हर रंग बिनतेरे फीके है..मेरी जिन्दगी है बेरंग मैं तनहा हु इस महफ़िल में ..... तन मेरा महकता है...जब तू मुझको छूता है.. पंख लगते अरमानो को.. बाहों में मुझको जब लेता है.. लेता है....गम लेता है. मैं भूला भटका रहे हु.. कोई मंजिल नही मेरे संग मैं तनहा हु इस महफ़िल में....... यादे तेरी रुला जाती है . दिल में प्यास जगा जाती है.. २ पल पल जलते है अरमा मेरे , सपनो को सपना बना जाती है.. थम लो डोरी मेरे प्यार की कही कट ना जाये पतंग .... मैं तनहा तनहा हु महफ़िल में..जब तू जो नही मेरे संग तुमसे जुदा हो के जी ना पाएंगे हम... बिन तेरे मर जायेंगे हम २ टुकडो में तुम जी लोगे...टूट के हम बिखर जायेंगे सनम हो वो हो होहो आहा अहः हां जाते हो मुझको छोर के तुम यादे व् अपने ले जावो तुम जाते जाते एक ठोकर दिल को मेरे दे जावो तुम..फिर हम कभी ना याद आयेंगे.. फिर ना होगी सिकवा कोई फिर ना जलेगी समां कोई...फिर ना बुझेगी अरमा कोई. यादो से जख्मो को सी लेंगे... चाहे लग जाये कितने पैबंद मैं तनहा तनहा इस महफ़िल में... जो तू जो नही मेरे संग

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--- संजय सेन सागर

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