Wednesday, April 29, 2009

Loksangharsha: गजल हो गई..



है लहर जानती तल की गहराइयाँ ।
आदमी का वजन उस की परछाईयाँ ।
आंसुओ की किताबो में पढ़ लीजिये -
जिंदगी की कसक और रुसवाईयाँ ॥

छोड़ अमृत गरल की किसे प्यास है
कल से अनजान लोभ का दास है।
आदमी राम- रहमान कोई भी हो -
चार काँधा, कफ़न आखिरी आस है॥

प्रीत परवान चढ़ जाय तो गीत है ।
यदि आँखों से वह जाय तो गीत है ।
मन में बरमाल की कामनाएं लिए -
फूल अर्थी पे चढ़ जाए तो गीत है॥

मेरे नैनो की बदरी सजल हो गई ।
मन के आकाश में सुधि विकल हो गई ।
देख कर खोदना उंगलियों से जमीं -
झुक के पलके उठी तो गजल हो गई ॥

डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल 'राही'

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