Friday, April 24, 2009

Loksangharsha: मुक्तक

मुक्तक


ताप से तप से कभी-
राग से रस से कभी-
जीवन विसंगतियों भरा -
राम से रब से कभी॥

तुम मिलो जिंदगी दीप वन जल उठे ।
अश्रु की धार में प्यार भी पल उठे ।
भावना के सलोने मधुर दे बता-
तुम मिलो जिंदगी गीत में ढल उठे॥

तूलिका सी वरौनी सजाये हुए।
भेद भरे नैन सपने संजोय हुए।
कोर काजर ह्रदय पर करे घात यों-
जैसे मुनि मेनका में समाये हुए॥

लाल अंधेरो में मोती सजाये हुए।
नासिका सुकू सी गर्दन झुकाए हुए।
चैन छीना है मादक कपोलो ने यों-
जैसे राधा ठगी दृग लगाये हुए॥

डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल 'राही'

3 comments:

  1. लाल अंधेरों में मोती सजाएँ है
    इन शब्दों ने दिल जीत लिया !

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  2. लाल अंधेरों में मोती सजाएँ है
    इन शब्दों ने दिल जीत लिया !

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  3. इतना सुंदर लिखे हैं आप की दिल खुश हो गया! तितली का फोटो भी खूब लगाया है आपने! आप एक बहुत ही उंदा लेखक और कवि है!

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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