Monday, April 13, 2009

Loksangharsha: घर जला रहे है

Loksangharsha: घर जला रहे है

घर जला रहे है



बुझानी थी आग जिनको वही घर जला रहे है।
निभानी वफ़ा थी जिनको वही घर जला रहे है।


हसरत थी आसमां को छु लेंगे झूमकर
परवाज खो चुके जो वही घर जला रहे है ॥


एक घर की आग से ही जलती है बस्तियां,
मेरे रफीक फ़िर भी मेरा घर जला रहे है॥

अहले हयात ख्वाहिशों में यूँ सिमट गई
हमराज हमसफ़र मेरा घर जला रहे है ॥

2 comments:

  1. बढ़िया लेखन
    इसी तरह आगे अग्रसर हो
    यही सुभकामना है !

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  2. बढ़िया लेखन
    इसी तरह आगे अग्रसर हो
    यही सुभकामना है !

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--- संजय सेन सागर

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