Saturday, April 11, 2009

Loksangharsha: जानी जानी सब अनजानी हो गई।

जानी जानी सब अनजानी हो गई।


जानी -जानी सब अनजानी हो गई।
मेरे संग थोडी बेईमानी हो गई॥
भूखी भोर रात भर कराहती रही -
कैसी बेमिसाल ये गरानी हो गई ॥
सत्ता -सुख-वैभव के जाल में फ़ँसी -
राम वाली आस्था पुरानी हो गई ॥
स्वप्न में भी जलती चिताएं दिखती -
हाय मेरी बिटिया सायानी हो गई ॥
तेरे इक इशारे से बदल गया सब-
सूनी सूनी शाम भी सुहानी हो गई ॥
------------------ डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल 'राही'

4 comments:

  1. यशवीर जी की रचनाओं ने दिल जीत लिया
    पढ़कर मजा गया
    शुक्रिया सुमन जी

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  2. जानी -जानी सब अनजानी हो गई।
    मेरे संग थोडी बेईमानी हो गई॥
    भूखी भोर रात भर कराहती रही -
    कैसी बेमिसाल ये गरानी हो गई
    bahut sundar rachana badhai.

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  3. बहुत अच्छा लिखा है आपने.

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर