Thursday, April 23, 2009

जब से दर्पण देखा है,,

यौवन का चेहरा दर्पण में देखा।
तब से आँखों में कजरा लगाने लगी है॥
भौरे द्वारे में आके मडराने लगे।
ये बेदर्दी है जो भाव खाने लगी है॥
सज के स्वर के निकलती है घर से।
मन के बगिया से खुशबू निकालने लगी है॥
इशारा तो करती आने को ये।
पास आते ही ख़ुद ही चहकने लगी है॥
मुडके देखो न इनको तो ताने है देती।
हंस के बोलो इन्हे तो महकने लगी है॥
बाह पकडो जब इनको तो मौसम है हस्ता।
शर्मा के ख़ुद ही चलने लगी है॥

2 comments:

  1. शर्मा के खुद ही चलने लगी है
    या
    मन ही मन वो मचलने लगी है

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  2. अनुपम जी मै आप की लिखी हुयी लाइन सम्लित कर

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--- संजय सेन सागर

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