Monday, April 27, 2009

एक पद

पद -तुकांत कविता का एक छंद होता है -गीत जैसा --
हे घन बरसो बन कर प्यार।
प्रेम सुधा बन सरसे तन-मन जीवन हो रस सार।
नैन नैन मैं रस रंग बरसे सप्तम सुर झंकार।
मन मन हरषे जन जन झूमे , झूम उठे संसार।
प्रीति की वंशी बजे बसे जग राधा-कान्ह सा प्यार।
प्रीति बसे मब सब जग अपना ,प्रीति के रंग हज़ार।
प्रीति के दीप जलाए चलो नर सब जग हो उजियार।
प्रीति किए से प्रीति मिले जग ,मिले सकल सुख सार।
श्याम जो प्रभु की प्रीति बसे मन ,मिले ब्रह्म ,जग सार।।
हे घन बरसों बन कर प्यार।

1 comment:

  1. अच्छा लिखा है
    इसी तरह लिखते जाइए

    ReplyDelete

आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

लो क सं घ र्ष !: राजीव यादव की सरकारी हत्या का प्रयास

आजादी के बाद से आज तक के इतिहास में पहली बार भोपाल कारागार से आठ कथित सिमी कार्यकर्ता कैदियों को निकाल कर दस किलोमीटर दूर ईटी  गांव में...