Tuesday, April 7, 2009

मां का दर्द

अमित कुमार दुबे
वरुण गांधी आज एक ऐसा चेहरा बन गया है। जो इस चुनावी-संग्राम में पक्ष-विपक्ष के लिए सबसे पहला मुद्दा है।
वरुण के जह्न में भी कभी नहीं आया होगा कि उनका बयान उन्हें हीरो और विलेन दोनों रूप में प्रस्तुत करेगा। एक छोटी से लेकर बड़ी राजनीतिक पार्टियां वरुण मुद्दे को भुनाने में लगी है। दरअसल पहले तो उत्तर प्रदेश सरकार ने चुप्पी साध रखी। लेकिन जब चुप्पी तोड़ी तो एक नया रूप देखने को मिला। दरअसल राज्य सरकार के समक्ष एक समस्या आ गई कि इस मुद्दे पर अगर कड़े कदम नहीं उठाए गए तो जनाधार में बट्टा लग सकता है और आनन-फानन में वरुण रासुका लगा दिया गया।
वहीं समाजवादी पार्टी और कांग्रेस एक ही राग जप रही है कि इसके पीछे बसपा और बीजेपी की मिलीभगत है। खुद बीजेपी वरुण को लेकर पशोपेश में पड़ी है। उसे ये भी पता है कि वरुण मुद्दे पर पीलीभीत के हिन्दुओं की ही नहीं पूरे सूबे में अपना खोया जनाधार को फिर से पाया जा सकता है। लेकिन राष्ट्रीय मुद्दा बनाने में हिचकिचा रही है। क्योंकि कहीं सहयोगी रूठ न जाएं।

मालूम हो कि वरुण मामले पर जदयू नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। जबकि दूसरी ओर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अलपसंख्यकों को अपने वोट वैंक की कतार में जोड़ने में लगे हैं। और उन्होंने ऐलान कर दिया है कि उन्हें मध्यप्रदेश ना तो वरुण चाहिए ना ही वरुण का बयान उनके लिए कोई मुद्दा है।
लेकिन इन सबके बीच गांधी परिवार के लाडले वरुण कानून के शिकंजे में घिरते जा रहे हैं। उन्हें राजनीतिक कारणों से या सुरक्षा को ध्यान में ऱखते हुए पीलीभीत की जेल से एटा जेल में शिफ्ट कर दी गई है। जहां उन्हें कई बंदिशों का सामना करना पड़ रहा है। एक आम कैदी की तरह जेल के खान-पान से ही संतुष्ठ होना पड़ रहा है। देखिए, मौके की नजाकत को भांपते हुए शिवसेना ने तो यहां तक कह दिया कि वरुण में संजय गांधी की झलक दिखती है और हिन्दुओं के लिए ये गौरव की बात है।
लेकिन एक मां दर्द.. जी हां, मेनका गांधी कहती हैं कि सूबे की मुख्यमंत्री क्या जानें एक मा का दर्द। मेनका को लगता है कि उनके लाडले को राजनीतिक साजिश की तहत जेल में डाला गया है और रासुका जैसा कानून लगाया है। मेनका के इस बयान पर सूबे की मुखिया ने चुप्पी तोड़ी और पलटवार करते हुए कहा कि मेनका को एक बेटे का ख्याल है। लेकिन वो तो पूरे देश के मांओं की दर्द को समझती हैं। मायावती ने मेनका को नसीहत देते हुए कहा कि अगर केवल जन्म देने से मां का ममता एहसास होता तो आज मदर टेरेसा पूरे विश्व के लिए ममता और प्यार के लिए नहीं जानी जातीं। माया ने वरुण के परवरिश पर ही सवाल खड़े कर दिए, कहा- अगर वरुण को सही परवरिश दी गई होती हो वो इस तरह के सांप्रदायिक बयान नहीं देते।जो भी इस पूरे खेल में गांधी परिवार, राजनीति, कानून और मां का दर्द साफ-साफ छलकता है।
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6 comments:

  1. अमित जी आपने बहुत अच्छा लिखा
    वरुण गाँधी सभी दलों के लिए एक अच्छा मुद्दा बनकर उभरा है
    सही लिखा

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  2. बहुत अच्छा लिखा है मैं आपके लेख पहले भी पड़ चुकी हूँ

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  3. aapka लेख पढ़कर अच्छा लगा
    काफी सुन्दर लिखा है

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  4. माँ के सामने राजनीती का कोई स्थान नहीं है...माँ की ममता के सामने सब बेमानी है...!लेकिन इस भावना को मायावती समझ नहीं पाई और अपनी तुलना मदर टेरेसा से करने लगी....अब क्या कहें...?

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  5. रजनीश जी की बातों से सहमत हूँ

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आपका बहुत - बहुत शुक्रिया जो आप यहाँ आए और अपनी राय दी,हम आपसे आशा करते है की आप आगे भी अपनी राय से हमे अवगत कराते रहेंगे!!
--- संजय सेन सागर

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