Sunday, April 19, 2009

कुलदीप शर्मा जी का प्रभावशाली पत्र

कुलदीप शर्मा
दैनिक भास्कर और नई दुनिया में काम कर चुके कुलदीप शर्मा भोपाल में रहकर अब स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन करते हैं। फिलहाल पिछले 60 साल की राजनीति पर पुस्तक लेखन में व्यस्त। संपर्क-

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इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद वर्ष 1985 में हुए लोकसभा चुनाव के बाद कांगे्रस को पूरे देष में न सिर्फ जबर्दस्त बल्कि ऐतिहासिक सफलता मिली और भाजपा को केवल दो सीटों से संतोष करना पड़ा। इतना ही नहीं उस चुनाव में पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष अटलबिहारी वाजपेयी स्वयं ग्वालियर से माधवराव सिंधिया से चुनाव हार गए। उस समय मैं काॅलेज में था और छात्र राजनीति में सक्रिय भी था। जोष ही जोष में अटलबिहारी वाजपेयी को एक लंबा पत्र 19 मार्च 1985 को लिखा कि आपकी पार्टी की ऐसी दुर्दषा क्यों हुई। इस पत्र को लिखकर मैं इस घटना को भूल सा गया कि करीब दो महीने बाद अचानक एक दिन अटलबिहारी वाजपेयी लिखा लिफाफा मिला। मैंने अपने पत्र में जो मुद्दे उठाए थे, एक नेता की तरह उन सभी का जवाब उन्होंने दे दिया था, लेकिन बाद के समय में अपनी नीतियों में व्यापक परिवर्तन भी किया। मेरे द्वारा उठाए गए सभी मुद्दों का विवरण तथा यह मानने का कारण कि अटलजी को सत्ता षिखर तक पहुंचाने में मेरा भी थोड़ा योगदान है, कुछ इस तरह से है।13 का आंकड़ाइंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद हुए चुनाव में जब अटलजी स्वयं ग्वालियर से चुनाव हार गए थे, तब भाजपा अध्यक्ष होने के नाते मैंने अटलजी को एक लंवा विश्लेषणात्मक पत्र लिखा था, जिसमें उन कारणों को गिनाया गया था, जिसकी बदौलत पार्टी को केवल दो सीटों से ही संतोष करना पड़ा था। लोगों के जेहन में यह बात अवश्य आएगी कि क्यों मैं इस बात को महत्व दे रहा हूं कि मेरे वजह से ही अटलजी प्रधानमंत्री बने? ऐसे न जाने कितने पत्र उन्हें मिलते होंगे? तो इसकी तारीख पर गौर किया जाना सबसे जरूरी है, क्योंकि 19 मार्च 1985 को मेरे द्वारा अजमेर से लिखे गए पत्र के ठीक 13 साल बाद 19 मार्च 1998 को अटलजी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। यह वह शपथ थी, जिसके बाद 13 महीने तक उन्होंने शासन किया, क्योंकि 1996 में तो वे केवल 13 दिन ही प्रधानमंत्री रह पाए थे।गांधीवादी समाजवाद की जगह आया राम मंदिर का मुद्दामेरे द्वारा अटलजी को भेजे गए इस पत्र में यह तो हुई 13 के आंकड़े की बात। अब आती है मुद्दों की बात तो सबसे बड़ा मुद्दा तो यही है कि इस पत्र के बाद से अपनी हिन्दूवादी छवि को बनाने के लिए राम मंदिर का मुद्दा उठाया गया, अन्यथा अटलजी तो इसे गांधीवादी समाजवाद की ओर ले जाने को तत्पर थे। (वर्ष 1985 के राजस्थान के सीकर में हुए पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन के समाचारों से इसकी तस्दीक की जा सकती है।)इस पत्र से पहले तक छद्म धर्मनिरपेक्षता जैसी कोई बात थी ही नहींमेरे पत्र का जवाब देते हुए अटलजी ने अपने पत्र में कहा कि जहां तक सेक्यूलर होने का सवाल है, जनसंघ और भाजपा की नीतियों में कोई अंतर नहीं है। इस समय तक भाजपा के शब्दकोश में छद्म धर्मनिरपेक्षता जैसा कोई शब्द था ही नहीं,। अपने पत्र के माध्यम से जब मैंने इस बाबद सवाल किया तो ही छद्म धर्मनिरपेक्षता उपजा और आक्रामक रूप से कांग्रेस पर हमला बोला गया और इसी के बाद से अन्य दल धर्मनिरपेक्ष दलों की एकता की बात करते नहीं अघाते हैं।एकता यात्रा का परिणाम भी रहा यह पत्रइस पत्र के लिखे जाने से पहले तक कश्मीर के लिए बनाई गई धारा 370 के बारे में लोगों में जागरूकता का अभाव था। हर आम और खास को इसकी जानकारी हो सके इसके लिए ही मुरलीमनोहर जोशी ने एकता यात्रा की पहल की थी।शुरुआत के 6-7 साल तक अन्य दलों से तालमेल से किया परहेजमेरे द्वारा पत्र लिखे जाने के बाद हुए चुनावों में अन्य दलों से तालमेल करने से परहेज किया गया। यह सिलसिला केवल 6-7 साल तक कायम रहा, लेकिन बाद में इसे छोड़ दिया गया। यदि कुछ वर्ष और इस बात से परहेज किया जाता तो शायद 1996 में ही भाजपा को पूर्ण बहुमत मिल गया होता।इस पत्र के बाद जरूरत होने पर भी नहीं बने अध्यक्ष अटलजीमैंने अपने इस पत्र में यह प्रश्न भी उठाया था कि चाहे जनसंघ हो या भाजपा कांग्रेस की तरह ही इसमें अध्यक्ष गांधी परिवार की तरह हमेशा अटलबिहारी वाजपेयी होते हैं। मेरे इस सवाल से तिलमिलाए अटलजी ने यहां तक लिख दिया कि मैं मानसिक विकृति का शिकार हूं, लेकिन जाहिरा तौर पर इसके बाद अटलजी ने कभी भाजपा का अध्यक्ष पद स्वीकारना मुनासिब नहीं समझा। यदि 1996 में लालकृण आडवाणी की जगह भाजपा के अध्यक्ष अटलजी होते तो हो सकता है कि भाजपा को तभी पूर्ण बहुमत मिल गया होता। बाबरी मस्जिद को ढहाने के बाद भाजपा की ओर से अटलबिहारी वाजपेयी एकमात्र ऐसे नेता थे, जिन्होंने इस बात पर खेद प्रकट किया था। यदि उस चुनाव के दौरान अटलबिहारी वाजपेयी भाजपा अध्यक्ष होते तो बाजी पलट सकती थी, लेकिन मेरी बात शायद अटलबिहारी वाजपेयी को अंदर तक चुभ गई थी। तीन पेज का छोटा सा उत्तरमुझे भेजे गए जवाब के आखिरी पैराग्राफ में अटलजी लिखते हैं कि आपके लंबे पत्र का छोटा सा उत्तर भेज रहा हूं। उनके द्वारा लिखे गए इस वाक्यांश यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि मैंने कितना लंबा पत्र उन्हें लिखा था, जिसमें वे तमाम बातें थीं जिनकी बदौलत भाजपा की 1985 के चुनाव में ऐसी दुर्दशा हुई थी।इस पत्र को लिखे जाने के करीब 6-7 साल अटलजी से हुई बातचीत का हवाला दिया जाना भी गैरप्रासंगिक नहीं होगा। कोटा (राजस्थान) के चुनावी भाषण के बाद निजामुद्दीन टेªन में बैठने के बाद मैंने अटलजी से मुखातिब होते हुए कहा था- मैं, कुलदीप शर्मा, क्या आपको याद है कि मैंने अजमेर से एक लंबा विश्लेषणात्मक पत्र आपको लिखा था। यह सुनकर उन्हांेने कुछ देर सोचने के बाद जवाब दिया था- हां, इतने समय आप कहां रहे, आपको मिलना चाहिए था। इसके अलावा वे संभवतः और कहते भी क्या।
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