Saturday, April 25, 2009

गीतिका - आचार्य संजीव 'सलिल'

'सलिल' को दे दर्द अपने, चैन से सो जाइए.

नर्मदा है नेह की, फसलें यहाँ बो जाइए.

चंद्रमा में चांदनी भी और धब्बे-दाग भी.

चन्दनी अनुभूतियों से पीर सब धो जाइए.

होश में जब तक रहे, मैं-तुम न हम हो पाए थे.

भुला दुनिया मस्त हो, मस्ती में खुद खो जाइए.

खुदा बनने था चला, इंसा न बन पाया 'सलिल'.

खुदाया अब आप ही, इंसान बन दिखलाइए.

एक उँगली उठाता है जब भी गैरों पर; सलिल'

तीन उँगली चीखती हैं, खुद सुधर कर आइए.

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--- संजय सेन सागर

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