Friday, April 3, 2009

महिलाओं की मुंबई...

इस साल मुंबई पर एक फिल्म आ चुकी है और दो आनी बाकी हैं. मजे की बात ये है कि ये तीनों फिल्में महिला निर्देशकों ने बनाई हैं और तीनों की ये पहली फिल्में हैं. मंजुला नारायण का आलेख


सेंट्रल मुंबई की संकरी सड़कों पर कार लकड़ी से बनी बालकोनियों वाले भव्य एडवर्ड काल के अपार्टमेंट्स के सामने से गुजरती है. पेड़ों के पत्तों से छनकर आ रही सर्दियों की नर्म धूप 52 साल की सूनी तारापोरवाला के चेहरे को एक सुनहरी आभा प्रदान कर रही है. सूनी सलाम बांबे और मिसिसिपी मसाला सहित कई फिल्मों की स्क्रिप्ट लिख चुकी हैं और बतौर निर्देशिका उनकी पहली फिल्म लिटिल जीजू रिलीज होने के लिए तैयार है. फिलहाल मंजिल है स्लेटर रोड स्थित उनका दफ्तर.


अमेरिका में कोई मुहूर्त शॉट नहीं होता मगर हमारे यहां है. अगर काम धीमी रफ्तार से चलता तो हम कहते थे, अच्छा, वो नारियल लाओ
हम इमारत की लिफ्ट में दाखिल होते हैं और ये ऊपर की तरफ चल पड़ती है. इसमें लगे लकड़ी के पैनल और कई दूसरी चीजें लिफ्ट के काफी पुरानी होने की ताकीद करते हैं. मैं सूनी से सलाम बांबे की तारीफ और उससे जुड़ी दूसरी घिसी-पिटी बातें करने से खुद को रोकती हूं और लिफ्ट की कलात्मक बनावट पर चर्चा करने लगती हूं.


मगर हम दोनों के बीच असहजता का ये माहौल छंटने में ज्यादा देर नहीं लगती. दरअसल सूनी का स्वभाव ही ऐसा है कि आप उनके साथ बात करते हुए जल्द ही सहज हो जाते हैं. ऊपर से उनकी फिल्म के किरदारों जॉन अब्राहम, बोमन ईरानी, महाबानू कोतवाल और सूनी के बेटे व फिल्म में फुटबाल के पीछे पागल छोटे से जीजू की कमरे में लगी तस्वीरें भी इतनी दिलचस्प हैं कि आपको बातें करने के लिए ढेरों चीजें मिल जाती हैं. फिल्म के बारे में बताते हुए सूनी कहती हैं, ‘मेरी फिल्म में काफी किरदार थे. जब मैं स्क्रिप्ट लिख रही थी तभी से मुझे पता था कि मुझे किसे लेना है. मैंने अपने बच्चों जहां और इयाना के लिए भी भूमिकाएं लिखीं और ये उनके स्वभाव से पूरी तरह मेल खाती हैं. ये उनके व्यक्तित्व को ध्यान में रखते हुए लिखी गईं हैं.’


लिटिल जीजू की पूरी शूटिंग मुंबई में ही हुई है और इसे उन जगहों पर फिल्माया गया है जिन्हें पारसियों का इलाका कहा जाता है. ये एक ऐसी दुनिया है जिससे सूनी अच्छी तरह वाकिफ हैं. वो कहती हैं, ‘ये एक तरह से मेरी दुनिया ही है, ये वो बांबे है जहां मैं बड़ी हुई हूं और जहां मैं अब भी रहती हूं. पर हां, ये कहानी काल्पनिक भी है और भले ही इसकी पृष्ठभूमि में पारसी समुदाय है मगर मुझे उम्मीद है कि बाकी समुदायों के लोगों को भी इसमें अपनी जिंदगी से जुड़ी चीजें महसूस होंगी. ऐसा इसलिए क्योंकि फिल्म उन्हीं चीजों से प्रेरित है जो आज हमारी दुनिया में हो रही हैं मसलन धर्म का अपने मतलब के लिए इस्तेमाल करने वाले और उनका विरोध करने वाले लोगों के बीच का टकराव.’


सूनी के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी तय समय-सीमा के भीतर काम निपटाना. ‘जिन जगहों पर शूटिंग हुई उनमें एक वो भी थी जहां मेरा बचपन बीता. वहां पर हर सुबह शूटिंग शुरू होने से पहले मंदिर में प्रार्थना करके अपने तनाव को कम करने की कोशिश किया करती थी. ये फिल्म बनाने के बाद मैं समझी कि फिल्म इंडस्ट्री में इतना अंधविश्वास क्यों है. यहां आपको अच्छे भाग्य की ज्यादा से ज्यादा जरूरत महसूस होती है. अमेरिका में कोई मुहूर्त शॉट नहीं होता मगर हमारे यहां है. अगर काम धीमी रफ्तार से चलता तो हम कहते थे, अच्छा, वो नारियल लाओ’ हंसते हुए सूनी बताती हैं.


मैं उनसे पूछती हूं कि क्या वो कभी बॉलीवुड की मुख्यधारा की फिल्म बनाने के बारे में सोचेंगी? सूनी कहती हैं, ‘मुझे नहीं लगता कि मैं ऐसा ठीक तरीके से कर पाऊंगी और पता नहीं कि कोई ऐसी फिल्म देखना भी चाहेगा दरअसल अब बॉलीवुड में एक नई पीढ़ी उभर आई है जो ज्यादा व्यवस्थित तरीके से काम करने लगी है. यहां तक कि संवेदनाएं भी बदल रही हैं.’


इन फिल्मों में दरअसल मुख्य किरदार बांबे ही है. मगर इन निर्देशिकाओं की फिल्में रामगोपाल वर्मा की सत्या या डैनी बोएल की स्लमडॉग मिलियनेयर के शोर-शराबे और हिंसा से अलग हैं
नई पीढ़ी के इन्हीं फिल्मकारों में से एक हैं जोया अख्तर जिन्हें बदली हुई संवेदनाओं का एक उदाहरण कहा जा सकता है. 36 साल की जोया की पहली फिल्म लक बाय चांस हाल ही में रिलीज हुई है. मुंबई के सांताक्रुज स्थित एक्सेल फिल्म्स के ऑफिस में बैठी जोया कहती हैं, ‘90 के दशक के शुरुआती वर्षो तक हिंदी फिल्मों का स्तर इतना गिर गया था कि मुझे पता ही नहीं था कि मैं इसमें कहां फिट होऊंगी. फिर मैंने सलाम बांबे देखी और इसने मेरी सोच बदलकर रख दी. मुझे लगा कि दिखाने के लिए कई कहानियां हैं और जरूरी नहीं कि उन्हें हमेशा ‘लार्जर देन लाइफ’ बना कर ही दिखाया जाए. मैं सूनी को बहुत पसंद करती हूं और मैंने कामसूत्र के दौरान मीरा नायर के साथ काम किया है. ये दोनों एक तरह से फिल्म जगत में मेरी मम्मियां हैं.’


लक बाय चांस में जोया ने बॉलीवुड को अपना विषय बनाया है. इससे पहले इसी विषय पर बनी ओम शांति ओम को दर्शकों ने बहुत पसंद किया था. जोया की फिल्म भी खासी तारीफें बटोर रही है. मगर मेरे दिमाग में सवाल उठता है कि न सिर्फ जोया बल्कि उनका परिवार भी बॉलीवुड से ही जुड़ा रहा है, फिर उन्हें बॉलीवुड में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहे चरित्रों पर फिल्म बनाने की धुन कैसे चढ़ी. जवाब आता है, ‘मैं एक तरह से बॉलीवुड की देहरी पर रही हूं. हमारा बचपन कुछ-कुछ बंजारों की तरह बीता. जब हम छोटे थे तो मम्मी फिल्म स्कूल चली गईं थीं इसलिए हम सप्ताहांत में उनके साथ पुणे स्थित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट में घूमा करते थे. वहां हमने हिंदी फिल्मों के अलावा अनगिनत विदेशी फिल्में भी देखीं. हमारे पास एक प्रोजेक्टर था और हम दीवार पर फिल्में देखा करते थे. वहां हर कोई फिल्मों के बारे में बात करता और कई कलाकारों, कवियों, लेखकों और सहायक निर्देशकों का जमावड़ा रहता. हालांकि मेरे बहुत से दोस्त ऐसे भी रहे जिनका फिल्मों से कोई संबंध नहीं था.’


लक बाय चांस की स्क्रिप्ट का पहला ड्राफ्ट जोया ने गोवा में तीन महीनों की छुट्टियों के दौरान लिखा. वो बताती हैं, ‘हमने दिल चाहता है खत्म ही की थी और फरहान और रितेश मेरी फिल्म को प्रोडच्यूस करना चाहते थे. मगर हमें सूझ ही नहीं रहा था कि हीरो के लिए किसे चुना जाए क्योंकि वो एक संघर्ष करने वाला और कैसे भी अपना काम निकालने वाला किरदार था जो लोगों से बहुत ज्यादा सहानुभूति भी नहीं रखता था. उस समय लोगों को लगा कि दर्शक इस तरह की फिल्म को पचा नहीं पाएंगे. इसलिए हमने इसे लंबे समय तक ठंडे बस्ते में डाले रखा. इस दौरान मैं कुछ और चीजें करती रही. जब मल्टीप्लेक्सेज का जमाना शुरू हुआ और कॉरपोरेट्स आ गए तो सब कुछ बदल गया. अचानक ही फिल्म उद्योग में पैसा आ गया था. फिर हनीमून ट्रैवेल्स बना रहीं रीमा कागती ने मुझसे फरहान को लेने के लिए कहा और काम शुरू हो गया.’


उधर, 35 साल की किरण राव की नजर में बंबई का सबसे सही प्रतिनिधित्व करने वाली चीज है धोबी घाट और वो इसी नाम से एक फिल्म बना रही हैं. अपने पॉली हिल स्थित ऑफिस में बैठी किरण कहती हैं, ‘मैंने फिल्म की कहानी लिखने से पहले ही इसका शीर्षक सोच लिया था क्योंकि यहां छोटे-बड़े सभी के कपड़े धुलने के लिए आते हैं. ये एक तरह से सबको बराबरी पर ला खड़ा करता है. बांबे भी तो ऐसा ही है.’


स्वाभाविक ही है कि आप सोचें कि उनकी इस फिल्म में आमिर खान अपनी मसल्स चमकाते हुए कपड़ों को धोबी पटका देते नजर आएंगे. मगर फिर आपको पता चलता है कि धोबी घाट में ये काम राज बब्बर और स्मिता पाटिल के बेटे प्रतीक बब्बर कर रहे हैं. इस फिल्म के दूसरे मुख्य किरदारों में दो लड़कियां हैं जिनमें से एक ने उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाली एक पेंटर और दूसरी ने अमेरिका से भारत लौटी एक युवती की भूमिका निभाई है.


किरण बताती हैं, ‘ये फिल्म बांबे के बारे में है जो अलग-अलग वर्गों से ताल्लुक रखने वाले चार किरदारों के जरिए इस शहर को समझने का प्रयास करती है. मैं, उनके रोजमर्रा के अनुभवों के जरिए जहां उनकी जिंदगियां उनके बिना जाने एक-दूसरे को थोड़ा-थोड़ा प्रभावित करती हैं, इस शहर की कहानी को एक धागे में पिरोना चाहती थी. मुझे लगा कि तरह-तरह के दृश्यों का कोलाज बांबे की अलग-अलग परतों को समझने में मदद करेगा.’ किरण बताती हैं कि पहले वो फिल्म का फिल्मांकन खुद ही करना चाहती थीं मगर फिर उन्होंने अपना विचार बदल दिया.


सूनी की तरह ही किरण ने भी फिल्म की शूटिंग के लिए वास्तविक जगहों और असल लोगों का इस्तेमाल किया है. वो कहती हैं, ‘कैमरे के सामने सहज रहने वाले सबसे प्रतिभाशाली लोग वो थे जिन्हें गलियों से उठाकर एक किरदार थमा दिया गया था. ये एक बेहद संवादात्मक फिल्म है जिसमें हमने कोशिश की है कि कोई एक्टिंग न करे. यही वजह है कि हमने लोगों की भूमिकाएं वही रखी हैं जो वे असल जिंदगी में हैं. इसलिए एक नौकरानी को नौकरानी ही बनाया गया है. अगर आप इस तरह की असलियत चाहें तो ये मुश्किल नहीं है.’


हालांकि धोबी घाट एक छोटी फिल्म है मगर उसके बावजूद इसके बनने में आ रहे झंझट किसी मेगा मूवी से कम नहीं हैं. खासकर इसलिए क्योंकि इसमें कहीं-कहीं हिंदी फिल्म उद्योग का एक बड़ा सितारा भी है. किरण कहती हैं, ‘हमने इसे सबसे मुश्किल लोकेशंस पर फिल्माया. माहिम के रेलवे ट्रैक्स के पास एक झुग्गी से लेकर रमजान के दौरान आमिर खान के साथ मोहम्मद अली रोड पर शूटिंग करना किसी आर्मी ऑपरेशन सरीखा रहा.’


इन फिल्मकारों से बातचीत के दौरान पूरे वक्त मैं महिला फिल्म निर्देशकों जैसे शब्द का इस्तेमाल नहीं करती. इसकी मुख्य वजह ये है कि कुछ समय से अब महिलाओं द्वारा फिल्म निर्देशन कोई नई बात नहीं रही. फराह खान और रीमा कागती जैसी निर्देशिकाओं की फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर खासी कामयाबी भी बटोरी है तो सुहासिनी मणिरत्नम और रेवती ने दक्षिण में कई गंभीर फिल्में बनाई हैं. उधर, मीरा नायर और दीपा मेहता ने ऐसी फिल्में बनाई हैं जिन्हें अंतर्राष्ट्रीय मंचो पर काफी तारीफ मिली है.


जो बात आपका ध्यान अपनी तरफ खींचती है वो ये है कि इन फिल्मों में दरअसल मुख्य किरदार बांबे ही है. मगर इन निर्देशिकाओं की फिल्में रामगोपाल वर्मा की सत्या या डैनी बोएल की स्लमडॉग मिलियनेयर के शोर-शराबे और हिंसा से अलग हैं. सूनी, किरण और जोया बांबे को पृष्ठभूमि में रखकर इस शहर की सहिष्णुता और भौतिक सफलता के लिए लोगों के संघर्ष जसे वृहत्तर विषयों को समझने की कोशिश करती हैं. इनमें कहीं मुंबई पारसियों का प्यारा सा घर है तो कहीं रुपहले पर्दे के जरिए अपनी जिंदगी को बदलने का सपना देखने वाले उन लोगों का शहर जो देश के कोने-कोने से इसके आकर्षण में बंधे यहां चले आते हैं. तहलका हिंदी से साभार
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--- संजय सेन सागर

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